हाथ का महत्त्व
हाथ का बड़ा प्रचार हो रहा है, हर हाथ को काम, इस हाथ ने न जाने क्या क्या किया. टेलिविजन के अलावा भी मुझे एक हाथ रोज दिखाई देता है, हो सकता है (नहीं बल्कि होगा) आपको भी दिखाई देता हो, सड़क के किनारे पुलिस वाले खड़े होते हैं, कहीं पर नहीं होते, जहां वे नहीं होते, वहां उन्होंने अपनी जगह होमगार्ड को या कहीं कहीं किसी पान की दुकान चलाने वाले को प्रतिनियुक्त कर देते हैं. अब इससे हाथ का क्या सम्बन्ध है, बताता हूं, सड़कों पर जहां कि नगर में प्रवेश या निकासी की जगह होती है, वहां, ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में चौकी और थानों के आगे आप इन हाथों को देख सकते हैं. क्या खूब नजारा होता है, नीचे से एक हाथ बढ़ा और एक हाथ ऊपर से बढ़ा, हाथ से हाथ मिला. एक हाथ ने रिजर्व बैंक द्वारा जारी एक प्रमाणपत्र ऊपर से नीचे की ओर बढ़ाया. नीचे वाले हाथ ने प्रमाणपत्र को झपटा और नीचे वाले हाथ ने तेजी से उस प्रमाणपत्र को अपनी पैंट की जेब में सुरक्षित कर लिया. वाहन वाला हाथ भी अन्दर पहुंच गया. हाथ की महिमा अनन्त.
कई बार जल्दबाजी में गड़बड़ भी हो गयी, एक बार बड़ा दुर्लभ नजा्रा देखने को मिला, एक चौराहे पर एक हाथ ने दूसरे हाथ तक प्रमाणपत्र पहुंचाया, दूसरे ने तेजी से अन्दर किया, थोड़ी देर बाद देखा तो पाया कि वह रिजर्व बैंक के गवर्नर द्वारा सत्यापित नहीं था, बच्चों के खेलने के लिये मिलने वाले नोटों में से एक था। नीचे वाला हाथ धारक व्यक्ति अब ऊपर के हाथ वाले व्यक्ति से रिश्तेदारी जोड़ रहा था . दूसरी बार नीचे वाले हाथ को ऊपर वाले हाथ ने प्रमाणपत्र देने के बहाने खिड़की पर खींच लिया और करीब आधा किलोमीटर तक नीचे वाला उतार देने के लिये गिड़गिड़ाता रहा. एक बार तो एक के लिये शहादत मिलने में भी अहम भूमिका निभाई इस हाथ ने. ऐसे ही एक मामले में नीचे वाला लटक गया और उतरते समय ट्रक के नीचे आ गया. मामला अफसरों की जानकारी में पहुंचा, चालक चिल्लाने लगा कि वसूली कर रहा था नीचे वाला हाथ. रास्ता निकाला गया कि अपनी ड्यूटी करते समय दुर्घटना हो गयी, कर्तव्य मार्ग पर शहीद हो गये श्री ............. . उनकी धर्मपत्नी को नौकरी मिली, पेंशन, गेच्युटी वगैरा-वगैरा.
नीचे वाले हाथ रोज शाम को इकट्ठा होते हैं, प्रमाणपत्र गिने जाते हैं, नीचे से ऊपर तक प्रमाणपत्र बंटते जाते हैं। यूं रोज समाजवाद आ जाता है सड़क और हाथ के माध्यम से। देश हमारा है इसलिये अपना अपना हिस्सा घर ले जाइये. अब अगर दोनों हाथ इस सरल आवर्त गति में न हों तो क्या हो और होते हैं तो क्या होता है, इस पर भी थोड़ा ध्यान केन्द्रित कर लिया जाये. जब दोनों हाथ एक दूसरे के पूरक होते हैं तो ट्रक में क्या है, पूछने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती, ओवरलोडेड हो या उसके अन्दर चरस-अफीम-गांजा हो, जानवरों को एक के ऊपर एक खड़ा कर रखा हो, कागजात हों या न हो, एक ट्रक को फुलाकर दो ट्रकों के बराबर कर रखा हो, सारा काम बिना रोकटोक के चलता रहता है, बस शर्त एक ही है कि गांधी जी का आशीर्वाद रिजर्व बैंक के गवर्नर द्वारा जारी प्रमाणपत्र के रूप में सरल आवर्त गति करते हुये ऊपर वाले हाथ से नीचे वाले हाथ में पहुंच जाये.
अन्यथा की स्थिति में सबसे पहले कागजात चेक करने के नाम पर वाहन को रोका जायेगा, नीचे वाला हाथ अब रौद्र रूप धारण कर लेता है और सबसे पहले चार-छ: लगाता है ऊपर वाले हाथ वाले श्रीमान के. फिर कागजों की चेकिंग, अगर ठीक-ठाक नहीं हुये फिर तो कोई बात ही नहीं, अगर ठीक मिल गये तो एक ओर लगा दिये. नीचे वाला हाथ ताकतवर है, उसके आगे ऊपरवाले की क्या बिसात. नीचे वाला हाथ ऊपर वाले के शरीर पर चलना प्रारम्भ कर देता और फिर दिमाग ठीक करने में कितनी देर लगती है और फिर वही प्रक्रिया चालू प्रमाणपत्र देने की और प्रमाणपत्र लेने की. ट्रक फिर अपनी राह, फिर किसी मोड़ पर हाथ बाहर प्रमाण पत्र के साथ, प्रमाणपत्र दूसरे हाथ में, दूसरा हाथ अन्दर प्रमाणपत्र के साथ.
तीन सदाबहार चुटकुले -
पहला - एक बार पुलिस के अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय पुलिस भी पहुंची - जापान की पुलिस ने कहा कि हमारी पुलिस किसी भी केस का पता एक सप्ताह के अन्दर लगा लेती है। अमेरिकी पुलिस के प्रतिनिधि ने कहा कि हमारे यहां तीन दिन में पता चल जाता है. स्काटलैंड यार्ड पुलिस ने कहा कि वे एक दिन में पता लगा लेते हैं, इस पर भारतीय पुलिस के प्रतिनिधि ने कहा - "इसमें आप लोग कौन सा तीर मार लेते हैं, हमें तो वारदात से पहले ही पता लग जाता है."
दूसरा - बुश महोदय की बकरी खो गयी। पूरी दुनिया की पुलिस और जासूस ढूढ़ने में लग गये। घण्टा भर भी नहीं बीता कि भारतीय पुलिस के सफल होने की सूचना आ गयी. बुश को बहुत आश्चर्य हुआ कि इतनी जल्दी. बुश ने बकरी देखने को मंगा ली. सामने देखा तो एक इंस्पेक्टर एक भालू लेकर आ रहा था और भालू कह रहा था -"हुजूर मान तो लिया कि मैं ही बुश की बकरी हूं."
तीसरा - एक बार एक बस लुटी. डाकू सब कुछ लूट ले गये, कुछ देर बाद फिर डाकू आ गये. लोग घबरा गये, लगता था कि अब तो जान लेकर ही मानेंगे. एक डाकू आगे बढ़ा, लूट के माल की गठरी खोली, बोला सही सही बताना किस-किस का क्या क्या सामान लूटा था. लोग बताते गये सामान मिलता गया, अन्त में एक सज्जन ने पूछ ही लिया कि डाकू जी आज ऐसा अनर्थ क्यों? डाकू बोला - "साले-नंगों, बस का ठेका दो लाख में हुआ था, मिला केवल पचास हजार का माल, ऊपर से तुम लोग एक का तीन बताते, थानेदार को जेब से देता क्या?"लोग तीसरे वर्णन को सत्य घटना बताते हैं.
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