मतदान का कम प्रतिशत, अल्पसंख्यकों के लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं और आतंकवाद से निपटने में बाधक है भ्रष्टाचार
लखनऊ में मात्र ३३ प्रतिशत मतदान हुआ और मेरे अनुमान के अनुसार जो प्रत्याशी दस प्रतिशत मत प्राप्त कर लेगा वह संसद पहुंच जायेगा. इसका सीधा सा मतलब यह है कि १०० में से १० की पसंद ही १०० का प्रतिनिधित्व करेगी. यह एक बड़ी अप्रिय स्थिति है जिसके कारण दो-तीन सांसद वाले दल अति महत्व प्राप्त कर लेते हैं और फलस्वरूप सौदेबाजी की गुंजाइश हो जाती है. इससे यह भी पता चलता है कि भारतीय लोकतन्त्र कोई बहुत अधिक सफल और लोकप्रिय नहीं है. मतदाता राजनैतिक दलों से मायूस हो चुके हैं. इस स्थिति से निपटने के लिये निम्न उपाय किये जा सकते हैं.
१-मतदान को अनिवार्य बनाया जाये.
२-प्रधानमन्त्री का चुनाव सीधे जनता द्वारा किया जाये.
३-सांसद को चुनने के लिये पहली और दूसरी वरीयता की व्यवस्था की जाये.
४-महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिये ५४५ महानुभाव पर न छोड़ा जाये बल्कि इसके लिये जनमत संग्रह किया जाये जो बाध्यकारी हो.
५-प्रशासन को पूरी तरह से राजनैतिक व्यवस्था से अलग रखा जाये.
इस समय विश्व को अल्पसंख्यक रहनुमाओं तथा धर्मनिरपेक्ष नेताओं की घनघोर आवश्यकता है. हमारे देश के अल्पसंख्यक रहनुमा तथा धर्मनिरपेक्ष नेता पता नहीं कहां चले गये हैं आजकल, एक भी बयान नहीं आ रहा है, जबकि अल्पसंख्यकों पर बहुत अत्याचार हो रहा है. यकीन न हो रहा हो तो पाकिस्तान में देख लीजिये, औरकजई, पाकिस्तान में जजिया (जो भारत में भी मुगल शासकों ने लगाया था, जिसमें कुछ बड़े महान मुगल शासक भी शामिल रहे हैं) न चुकाने पर सिखों को बेघरबार कर दिया गया, इससे पहले भी पाकिस्तान में सिखों को ४ करोड़ रुपये जजिया के रूप में चुकाने पड़े थे. यहां मुसलमानों के वोट पाने के लिये किसी भी स्तर तक उतरने वाले धर्मनिरपेक्षी और अल्पसंख्यकों के कल्याण की दुहाई के लिये गला फाड़ने वाले नेता अब कहां हैं? कहां छुप गये हैं स्वनामधन्य समाजसेवी और पत्रकार, मानवाधिकारों की पैरवी के नाम पर आतंकवादियों तक की हिमायत करने वाले लेखक और बुद्धिजीवी जिन्हें बेघरबार किये गये सिखों की हाय सुनाई नहीं देती. क्या वे मनुष्य नहीं हैं? या फिर ऐसा इसलिये है कि पाकिस्तान के निरीह सिखों के हितों को चिल्लाने से वोट नहीं मिलेंगे, इसलिये क्या फायदा. जब उनके लिये आवाज उठाने से अपना कोई स्वार्थ न सधे तो गला फाड़ने से क्या लाभ. चौरासी के सिख-नरसंहार के पुरोधा अभी भी बेखटके घूम रहे हैं, एक एफआईआर तक नहीं. लाखों कश्मीरी बेघरबार किये गये और मार डाले गये कोई शिकन नहीं. आखिर यह कैसे धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी, समाजसेवी, पत्रकार, नेता हैं, जिनके लिये इन बेचारे निरीह सिखों के लिये कोई हमदर्दी नहीं है. कैसी धर्मनिरपेक्षता है यह जो अल्पसंख्यकों में भी भेद करती है.
अमेरिकी विदेश विभाग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भ्रष्टाचार और धीमी न्याय व्यवस्था के चलते भारत में आतंक के विरुद्ध लड़ाई कमजोर हो चुकी है. यह भी उदाहरण दिया गया है कि पिछले तीन दशकों में जम्मू कश्मीर में हजारों-लाखों की संख्या में लोग मारे जा चुके हैं लेकिन कुल १०-१२ आतंकवादियों को ही सजा मिल सकी. यह रिपोर्ट का महज एक अंश है. लेकिन अपने आप में ही यह पूरे भारत की कहानी बयान करता है. देश का आम आदमी भ्रष्टाचार से बुरी तरह प्रभावित है, लेकिन हो भी क्या सकता है जब सत्ता ही भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा दे रही हो. सुखराम, लालू, अजहर और भी न जाने कितने अनगिनत मामले हैं जिनमें कुछ नहीं हो पाता. ताजा प्रकरण क्वात्रोची का है जिसमें सीबीआई का पूरा दुरुपयोग किया गया. ऐसे में स्थिति कुल मिलाकर निराशाजनक ही है.
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