कहाँ चले गए हैं फतवा देने वाले धर्मगुरु

कार्टून डेनमार्क की पत्रिका में छपा, फतवा जारी हुआ भारत में। सलमान ने गणपति पूजा में भाग लिया, फतवा जारी हो गया। मोबाइल की रिंग-टोंस पर फतवा जारी हो चुका है, बिना परदे के निकलने पर फतवा दिया जा चुका है। और भी न जाने कितनी ऐसी घटनाएँ और आधुनिक युग की तकनीकों तथा मशीनों से सम्बंधित अनगिनत फतवे जारी किए गए हैं। एक-दो बार तो यहाँ तक देखने में आया कि कुछ लोगों ने पैसे देकर भी मनमाफिक फतवे जारी करा लिए। भारत में छोटी से छोटी घटनाओं को लेकर फतवे जारी किए जाने का रिवाज या फैशन बन चुका है। लेकिन अब जब पाकिस्तान में सरे-आम सिखों पर जुल्म ढाये जा रहे हैं, ख़ुद मुस्लिमों के ऊपर तालिबानी लड़ाके अत्याचार कर रहे हैं, एक महिला को इसलिए गोली मार दी कि वह गाना गाती थी। कुछ दिनों पहले एक लड़की को इसलिए पीटा गया कि वह घर से अकेली निकल गई। किस बर्बर मानसिकता के लोग हैं यह, इसका नजारा रोज ही प्रत्यक्ष दिखाई देता है, लेकिन आज तक एक भी फतवा इस तरह की मानसिकता के विरुद्ध, इन लोगों के विरुद्ध जारी नहीं किया गया। क्यों आजतक शाही इमाम चुप बैठे हुए हैं? क्यों मुस्लिम धर्म-गुरु और मुस्लिम नेता इन पाशविक अत्याचारों के विरुद्ध मुंह सिले हुए बैठे हैं। यूँ तो ये लोग बड़ी शेखी बघारते हैं कि हम लोग बड़े सहनशील हैं, इस्लाम में अत्याचारों के लिए कोई जगह नहीं है, आतंकवादियों को कोई धर्म नहीं होता, औरत के लिए इस्लाम में पूरी आजादी मिली है, लेकिन यह सब एक लफ्फाजी मात्र है।
क्या इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि अधिकतर मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं की सोच एक ही जैसी है,यदि वहीदुद्दीन साहब जैसे कुछ अपवादों को छोड़ दें तो। और क्या इससे यह जाहिर नहीं होता कि इन धर्म-गुरुओं की सोच भी तालिबानियों से बहुत कुछ अलग नहीं है और इनके विरुद्ध चुप रहना भी क्या इन्हें समर्थन देना नहीं हैं? आख़िर क्यों चुप हैं ये सब?

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