धरती की पुकार को सुनें
मेरी आप सभी लोगों से यह प्रार्थना है कि धरती की पुकार को सुनें। धरती हमें क्या कुछ नहीं देती, खाने को अन्न, पीने के लिए जल, रहने के लिए स्थान, पहनने के लिए वस्त्र और भी न जाने क्या-क्या। लेकिन हम इस धरती को क्या देते हैं, प्रदूषण के सिवा। इस धरती को ओवर-क्राउडेड करने के अलावा और क्या योगदान रहा है हमारा? जंगल काटे जा रहे हैं खेत बनाने के लिए, खेतों की जगह सीमेंट की इमारतें खड़ी हो गयीं। नदी-तालाब सब बेमौत मारे जा रहे हैं। जल का अपव्यय हो रहा है, ग्लोबल वार्मिंग से पूरी दुनिया तबाही की तरफ भाग रही है, भारत में तो निश्चित रूप जल के लिए युद्ध होना निश्चित है। मेरी यही अपील है कि धरती पर से यह ओवर-लोडिंग कम कीजिए, और कम से कम पृथ्वी के लिए कुछ तो लौटाइये। देखिये किस तरह से बाँझ हो रही है धरती, कैसे जंगल के जंगल काटकर उसे नंगा किया जा रहा है। कैसे धरती का जल सोख कर उसे निर्जला किया जा रहा है। कैसे धरती की छाती पर सीमेंट की इमारतें बनायी जा रहीं हैं। कैसे धरती के सीने को फाड़कर बहुमूल्य खनिज पदार्थों का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। कैसे अपने छोटे से लोभ के लिए धरती का चीर हरण किया जा रहा है। अभी समय है चेत जाइए अन्यथा धरती जब इसका बदला लेगी तो सोचने के लिए भी मौका नहीं देगी। कुछ तो लौटाइये , ध्यान रखिये इस रत्नगर्भा पृथ्वी का।
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