पगला गए हैं लोग.
इस देश के लोग पगला गये हैं. कोई कहता है कि क्वात्रोच्ची को क्यों छोड़ दिया, कोई कहता है कि सुब्बा को निकाल बाहर करो, कोई कह रहा है कि मुख्तार और अजहर को टिकट क्यों, कोई कह रहा है कि काला धन वापस लाओ. कमाल है कि पूरे देश भंगेड़ी हो गया है.अरे भैया क्वात्रोच्ची के लिये दुनिया व्यापारी मान रही है और हमारा देश की स्वतन्त्र सीबीआई है कि पिछले बीस सालों से बेचारे के पीछे पड़ी हुई है. क्वात्रोच्ची इटली से, मैम इटली से, इसीलिये रिश्ता जोड़ डाला और परेशान कर डाला. क्वात्रोची ने किया ही क्या था. अरे भैया जिसे रिश्वत कह रहे हो वह तो कमीशन है, कमीशन इस देश में सरकार तक लेती है, अरे भैया सर्विस टैक्स भी एक तरह का कमीशन ही तो है. प्रापर्टी डीलर, गल्ला व्यापारी, आढ़ती तो बेचारे कमीशन पर ही करोड़ों की सम्पत्ति बना पाते हैं. कमीशन की महिमा पूछनी है तो सरकारी सिविल अभियन्ता से पूछो जो बतायेगा कि काम हो या न हो कमीशन होना चाहिये. तो अगर क्वात्रोची ने तोप दिलवाई और कमीशन पा लिया तो क्या हो गया. फिर एक स्वनामधन्य पत्रकार भी कह चुके हैं कि बोफोर्स न होती तो भारत कैसे कारगिल जीतता, अगली बार कभी ऐसा मौका आया तो बस नाम जपने लगेंगे बोफोर्स - बोफोर्स और फिर जरूरत ही नहीं पड़ेगी एक भी गोला दागने की. बस दुश्मन को पता चल जाना चाहिये कि भारत के पास बोफोर्स है. फिर यह ज्ञानचक्षु भी खुले कि कमीशन से ज्यादा खर्चा हो गया जांच में. मैं तो सुझाव देता हूं कि सभी घोटालों की जांच बन्द कर दी जाये जिससे कि सरकार का खर्चा बचे. लेकिन फिर दिमाग ने पलटी खाई कि अरे कूढ़-मगज तू हमेशा कूढ़-मगज ही रहेगा, अरे बिना दस साल जांच हुये सीबीआई क्लीनचिट दे दे तो संदेह नहीं हो जायेगा कि एजेंसी स्वतन्त्र नहीं है. इसलिये क्लीन चिट मिले तो कम से कम बीस साल की गहन छान-बीन के बाद. सो एक भद्र व्यापारी के साथ ऐसा सुलूक. इतने सालों तक कहां कहां पीछे पड़ी रही सीबीआई. मैं तो कहता हूं जो अधिकारी क्वात्रोची जी के पीछे पड़ गये उनकी पेंशन बन्द करके मुकदमा चलाया जाये. इस कालिख को धोने के लिये क्वात्रोची साहब को भारत रत्न से सम्मानित किया जाये कि भैया जो तोप तुमने दिलवाई उसके कारण ही कारगिल जीत सके, न तुम होते न तोप मिलती, न तोप मिलती न जीतते. बल्कि इसमें मुशर्रफ को भी शामिल किया जाये, न मुशर्रफ कारगिल कराते न लड़ाई होती और न बोफोर्स निकलती. क्वात्रोची भैया ज्यादतियों का शिकार होते रहते. और अब तो मन्नू भैया ने भी कह दिया है कि पूरी दुनिया कह रही है कि भारत की स्वतन्त्र सीबीआई ने एक भले आदमी को परेशान कर दिया. लेकिन हर दुख में एक सुख छुपा होता है, हर बुराई में भलाई छुपी होती है. अब जो है सो है कि एक भले आदमी को इतने दिनों बदनामी लेकर जीना पड़ा, अपने खाते सीज कराने पड़े, बेचारे के मुंह पर खामखाह कालिख पुत गयी लेकिन इससे एक फायदा हुआ, पूरी दुनिया को पता चल गया कि सीबीआई बिल्कुलै स्वतन्त्र है. किसी का जोर नहीं जिसे चाहे उसे लपेट दे, जिसे चाहे उसे छोड़ दे, अब इसी स्वतन्त्रता के चलते बेचारे क्वात्रोच्ची भैया इतने दिनों परेशान रहे. इस पर विपक्ष और मीडिया मानने को तैयार नहीं कि सीबीआई अपने आप काम करती है, किसी के दबाव में काम नहीं करती. और न माने तो एक उदाहरण और है, ऊपी में राशन घोटाला हुआ. सबसे बड़े न्याय के मंदिर ने जांच को कहा और सीबीआई ने जबाव दिया कि जांच नहीं की जा सकती घोटाला बड़ा है और लोग कम. इससे बड़ा और कौन सबूत होगा कि सीबीआई बिल्कुल स्वतन्त्र है. इस देश में हर कोई स्वतन्त्र है, स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. नेता और अफसर घोटाला करने के लिये, सीबीआई जांच करने या न करने के लिये, कर्मचारी अपना कर्तव्य निभाने या न निभाने के लिये, वोटर बेवकूफ बनने के लिये, आम आदमी गलत करने और कराने के लिये, सड़क किनारे खुले में जरूरी काम निपटाने के लिये, पुलिस वाले किसी की भी गत बनाने के लिये और लोग कहते हैं कि आजादी अभी भी नहीं मिली. कमाल है. अब सुब्बा को सजा हो गई लेकिन कार्रवाई न हो मेरी मर्जी, मुख्तार और अजहर को टिकट मिले, मेरी मर्जी, चौरासी में सिखों को जलाने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो न हो, स्वतन्त्रता है. अरे भैया लोग चिल्ला रहे हैं कि काला धन वापस लाया जाये, क्यों लाया जाये, उनके नाम खोले जायें, क्यों खोले जायें. मेरी मर्जी, भारत स्वतन्त्र है या नहीं, हम कोई तुम्हारे गुलाम हैं जो तुम कहोगे वही करेंगे. जो बाहर ले गये हैं, उन्होंने कितनी मेहनत की होगी इसे पैदा करने में, जाने कैसे कैसे खेल खेले होंगे, कितना दिमाग लगाया होगा, इसे बाहर ले जाने में. फिर जो ले गये हैं वे भी तो हमारे देश के ही तो लोग हैं, कोई विदेशी तो ले नहीं गये. अब अगर वे काबिल थे तभी तो कमा पाये, अगर मतिमन्दों तुममें अकल होती तो तुम कमा लेते. बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला, मैं तेरा जीजा तू मेरा साला. ऊपर से स्वतन्त्रता की गारंटी संविधान में दे रखी है फिर भी ऐसा व्यवहार कि गुलामों की तरह. हम स्वतन्त्र हैं इसलिये वही करेंगे जो हमारी मर्जी होगी. सब दुनिया ऊपर वाले की, सब धन ऊपर वाले का फिर धन-धन में भेदभाव कैसा. क्या काला क्या गोरा. काले की महिमा अपार. काले पर कोई रंग चढ़ता है क्या. श्याम-घनश्याम-मीरा-सूर-रसखान सब तो श्याम-कृष्ण वर्ण की ही महिमा है. काले-गोरे का भेदभाव खत्म हो रहा है, पूरी दुनिया निन्दा कर रही है कि श्वेत-अश्वेत का भेदभाव खत्म होना चाहिये लेकिन ये मूर्ख हैं कि काला-काला की रट लगाये हुये हैं. काले की महिमा अपार. काला न होता तो गोरे की पहचान कैसे होती, कृष्ण विवर न होते. काले पर मुहावरे कैसे बनते. राम-कृष्ण कैसे होते. अब चलें गणित की ओर, मेरी सरकार तेरी से अच्छी कैसे, तेरी सरकार के समय में आतंकवादियों ने ग्यारह हजार मारे, मेरी सरकार के समय में छ: हजार ही मारे तो किसकी बढ़िया हुई, मेरी या तेरी. अभी भी पांच हजार का मार्जिन है. आतंकवादी अभी भी पांच हजार को मार सकते हैं तब कहीं जाकर मामला बराबर होगा. पता नहीं कैसे देशवासी हैं ये जो इतना अन्तर भी नहीं समझते. बार-बार एक ही रट, अरे भैया, देश में क्या नेता शामिल नहीं हैं? नेता यानी देश और देश यानी नेता, इसलिये देश की सुरक्षा मतलब नेता की सुरक्षा और नेता की सुरक्षा मतलब देश की सुरक्षा. बेचारे नेता इतना त्याग करते हैं अपनी पीढ़ियां तक देश की सेवा में लगा देते हैं. लक्कड़दादा, परदादा, दादा, बाप, पुत्र, पोता, परपोता सब देश की सेवा में लगे रहे, इतना भीषण त्याग और कहीं मिलेगा. सवाल ग्यारह और छ: का, सवाल सुरक्षा का, कोसने को रह गये कौन, नेता. ऊ नेता जिनका पूरा खानदान लगा हुआ है जनसेवा में. पब्लिकै ऐसी है, क्या किया जाये.
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