वीरप्पा मोइली का बयान स्वागत योग्य

कानून मन्त्री बीरप्पा मोइली का यह बयान मायने रखता है कि जजों को अपनी संपत्ति सार्वजनिक करना चाहिये तथा इसके साथ ही उन्होंने एक न्यायाधीश पर महाभियोग लाने की भी बात की. जिस कार्य की उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश स्वयं अनुशंसा कर चुके हों उस पर राजनीतिक दलों द्वारा अमल करना बड़े आश्चर्य की बातहै. इससे पहले भी एक बार महाभियोग की कार्रवाई बड़े नाटकीय घटनाक्रम अंजाम ले चुकी है. दर-असल न्यायपालिका पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं लेकिन अब तक कोई ठोस प्रक्रिया नहीं अपनाई जा सकी. यूं तो रोज ही किसी किसी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई ठोस पहल नहीं हो सकी. वास्तव में सरकारें भ्रष्टाचार मिटाने के प्रति गंभीर हैं ही नहीं, भ्रष्टाचार मिटाने के लिये भ्रष्टाचार के कारण जानने पड़ेंगे और कारण का निवारण करना पड़ेगा. भ्रष्टाचार के मूल में अशिक्षा, गरीबी, अगाध जनसंख्या, मंहगाई, कानूनों का सटीकता से पालन होना, पुलिस प्रशासन द्वारा पक्षपात करना, सुप्त तथा असंवेदनशील सरकारी मशीनरी, बिलंबित न्याय तथा सबसे प्रमुख यह कि राजनीतिक दलों द्वारा भ्रष्ट व्यक्तियों का पालन पोषण किया जाना है. जब तक इन समस्यायों का निदान नहीं किया जाता भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लग सकेगा. अन्यथा कौन सा ऐसा अधिकारी और मन्त्री-विधायक है जिसे सड़कों पर वसूली के बारे में पता नहीं होता. नीचे के लोग वही करते हैं जो ऊपर वाले करते हैं, उन्हीं से प्रेरित होते हैं, उन्हीं के पद-चिन्हों पर चलते हैं. बहरहाल जज भी समाज के ही अंग हैं और सबसे महत्वपूर्ण स्थान पर सुशोभित भी, इसलिये यदि वे समाज में अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करेंगे तो इससे समाज का हित ही होगा. सरकार के लिये एक सुझाव देना चाहूंगा कि मुकदमों के निपटारे के लिये हर स्तरपर अधिकतम समय सीमा दो वर्ष निर्धारित की जाये जिससे कि लोगों को बिलंबित न्याय की जगह त्वरित न्याय मिल सके.

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