कांग्रेस की जीत के निहितार्थ

चुनाव परिणामों को आये हुये काफी अरसा बीत गया है, कांग्रेस को आशा के विपरीत बहुत अधिक सीटें मिल गयीं जिसकी उम्मीद स्वयं कांग्रेस को दूर-दूर तक नहीं थी. विशेषकर उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को संजीवनी मिल गयी, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि लोग कांग्रेस के प्रति एकदम इतना अधिक लालायित हो गये. पूरे देश में विशेषकर उत्तरप्रदेश में मुस्लिमों का मत चुनावों को एक अलग मोड़ देने में सक्षम है. इस बार मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में निर्णायक सिद्ध हुआ. इन चुनावों में एक अच्छी बात हुई तो यह कि वामपंथियों को मुंह की खाना पड़ी तथा दूसरी अच्छी बात यह हुई कि लालू तथा पासवान को जनता ने उनकी औकात बता दी. लेकिन कांग्रेस की जीत के निहितार्थ यह हैं:-

१- हिन्दुओं ने यह स्वीकार कर लिया है कि उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनना ही पड़ेगा तथा उन्हें आगे चलकर मुस्लिमों की दया-दृष्टि पर निर्भर रहना कुबूल है.
२- हिन्दू यह मान चुके हैं कि वे गुलाम हैं तथा गुलाम रहेंगे, उनकी रगों के अन्दर गुलामी कूट-कूट कर भर चुकी है.
३- हिन्दुओं ने यह भी स्वीकारा है कि वे इतिहास से कोई सबक नहीं लेते और न ही इतिहास की समझ उनके अन्दर है.
४- वे यह भी मान चुके हैं कि मुस्लिमों को हिन्दुओं की कीमत पर आगे लाया जायेगा तथा इसके लिये उन्हें कोई आपत्ति नहीं है.
५- हिन्दू अपने लिये फिर से इस्लामी शासन के अन्तर्गत शासित होना चाहते हैं.
६- देश के लोगों ने यह स्वीकार कर लिया है कि उन्हें भ्रष्टाचार से छुटकारा नहीं चाहिये. वे भ्रष्टाचार को शिष्टाचार के रूप में स्वीकार चुके हैं.
७- देश के लोगों ने यह भी स्वीकार कर लिया है कि लोकतन्त्र की आड़ में देश कुछ राजनीतिक घरानों की बपौती बन गया है.
प्रमाण सामने हैं :-

१- कांग्रेस के लिये मुस्लिम लीग सांप्रदायिक नहीं है, जोकि विशुद्ध रूप से मुस्लिम हितों की बात करती है.

२- कांग्रेस सच्चर कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप मुस्लिमों की बेहतरी के लिये बहुत जल्दी निर्णय लेने जा रही है. सच्चर साहब का कहना है कि मुस्लिमों की संख्या सरकारी नौकरियों में बहुत कम है, क्योंकि उनके अन्दर शिक्षित लोगों की कमी है - गोया कि हिन्दुओं ने मुस्लिमों को शिक्षा ग्रहण करने से रोका है तथा उन्हें जबरदस्ती आधुनिक शिक्षा हेतु विद्यालयों की जगह मदरसों में भेजते हैं.

३- सच्चर साहब यह तथ्य हाईलाईट नहीं करते कि भारत में सबसे अधिक रोजगार मुस्लिमों के हाथ में हैं. यहां रोजगार में अधिकतर बुनियादी कार्य शामिल हैं जिनके बिना देश की दैनिक गतिविधियां तथा अन्य मूलभूत गतिविधियां ठप्प हो जायेंगी.अभी से ही मुस्लिम नेता यह कहने लगे हैं कि अल्पसंख्यकों के लिये आया पैसा सिर्फ उन्हीं पर खर्च हो, लेकिन इसमें से अधिकतर पैसा आता किससे है, ८५ प्रतिशत हिन्दुओं से.यह तो ऐसे लग रहा है जैसे कि हिन्दुओं को मुस्लिमों पर लगाये गये टैक्स से पाला जा रहा है.

४- सच्चर साहब यह नहीं कहते कि मुस्लिमों में शिक्षा की कमी इसलिये है कि उनके यहां लोगों ने परिवारों को सीमित नहीं किया है तथा कट्टरता के चलते वे स्वय़ं आधुनिक शिक्षा को ग्रहण ही करना नहीं चाहते. लिहाजा मदरसों की पढ़ाई विश्वविद्यालयों की डिग्री-डिप्लोमा इत्यादि के समान समझी जाने में कोई हर्ज नहीं है.

५- वे यह तो बताते हैं कि मुस्लिमों की बस्तियों में गन्दगी है जिसके कारण उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ता है तथा बीमारियां भी फैलती हैं तथा इसके लिये वे उपचार भी बताते हैं लेकिन यह नहीं बताते कि इसके पीछे भी उनकी अगाध जनसंख्या तथा कट्टरपन जिम्मेदार है. पल्स पोलियो अभियान का प्रमाण सबके सामने है जहां दवा पिलाने वाली टीमों पर न जाने कितने बार हमला किया गया.

६- मकबूल फिदा हुसैन के विरोध में एक भी बात सहन नहीं होती, लेकिन तस्लीमा पर हमला करने वाले तथा खुले आम जान से मारने की धमकी देने वाले उन्हें प्रिय हैं.

७- डेनिश कार्टूनिस्ट का गला काटने वाले को इनाम देने वाले मन्त्री, इमामों, नेताओं पर कोई कार्रवाई तो दूर, एक निन्दा प्रस्ताव तक प्रस्तुत नहीं किया जाता लेकिन आतंकवादियों को मारने पर इनाम की घोषणा करने पर कठोर कार्रवाई करते हुये एफ०आई०आर० दर्ज करा दी जाती है.

८- हजारों सिखों को जलाकर मारने वालों के विरुद्ध पच्चीस वर्ष बीतने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती.

९- लाखों हिन्दुओं को कश्मीर में काटने-मारने पर एक भी आवाज नहीं उठती और अब कश्मीर घाटी में सिखों को भी बेघर करने की मुहिम चलाने की शुरूआत की जा चुकी है. यह है कांग्रेस की असली धर्मनिरपेक्षता.

१०- कानून का पालन करने की दुहाई देने वालों ने वोट बैंक की खातिर शाहबानो मामले में संविधान संशोधन कर कोर्ट की व्यवस्था को ताक पर रख दिया.

११- क्वात्रोची को चुनाव नतीजों से ऐन पहले क्लीन चिट दे दी गयी, जबकि सीबीआई के प्रमुख जोगिंदर सिंह के अनुसार क्वात्रोची के विरुद्ध पर्याप्त सुबूत थे.

१२- देश पर साठ साल शासन करने वाली पार्टी की एक प्रधानमन्त्री कहती हैं कि जब विकास होता है तो भ्रष्टाचार होता ही है, दूसरे प्रधानमन्त्री कहते हैं कि केन्द्र से चले एक रुपये में से लाभार्थी तक मात्र दस पैसे पहुंचते हैं तथा उनके सुपुत्र कहते हैं कि अब और बुरा हाल है कि मात्र पांच पैसे ही पहुंचते हैं तो यह पार्टी की उदारता नहीं है बल्कि बेशर्मी की हद है.

१३- देश कुछ घरानों की बपौती बन गया है, पहले दादा, फिर बाप और अब बेटा, एक मात्र यही खानदान देश को चला सकते हैं. प्रमाण है कि कितने मन्त्रियों के पोते-परपोते सांसद-मन्त्री बन गये हैं.

१४- मीडिया को सिर्फ यही युवा नजर आते हैं, उन्हें वे युवा नजर नहीं आते जो अपनी मेहनत के बल पर ज्ञान अर्जित करते हैं लेकिन आज के इस युग में बेरोजगार हैं. चूंकि उनके बाप-दादा मन्त्री-सांसद नहीं हैं इसलिये वे न तो युवा हैं और न ही योग्य.

१५- इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि देश का स्वरूप तभी तक धर्मनिरपेक्ष है जब तक हिन्दू बहुतायत में हैं, हिन्दुओं के अल्पसंख्यक होते ही हिन्दुओं के मुगालते दूर हो जायेंगे. इतिहास उठाकर देख लीजिये कि जहां कहीं भी मुस्लिम बहुसंख्यक हैं या हो गये वहां इस्लामी शासन व्यवस्था लागू कर दी गयी. स्वात घाटी में सिखों पर हो रहे जुल्म अपने आप इसकी कहानी बयान करते हैं और यह भी देख लीजिये कि कितने अल्पसंख्यक नेताओं तथा ब्लागर्स ने इसकी आलोचना की.

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