नगरों में बढ़ रहा एक अजीब सा चलन

नगरों में अजीब सा चलन हो गया है. नयी बनी कालोनियों में और पुरानी में भी लोगों ने सोसायटी का गठन कर लिया है और उसके बाद तीस-चालीस घर जो एक निश्चित दायरे में होते हैं अपने सम्पर्क मार्गों पर बड़े-बड़े दरवाजे लगा लेते हैं और उन पर ताला लगा देते हैं. उसके कुछ दिनों बाद उन तीन-चार सम्पर्क मार्गों में से एक ही खुला रह जाता है और धीरे धीरे वह घर एक टापू जैसे हो जाते हैं. मैंने लोगों से पूछा कि ऐसा क्यों किया जा रहा है तो कई कारण बताये गये. एक चोरी-चकारी से बचने के लिये. दूसरा ल़ड़कों की छेड़छाड़ से बचने के लिये, तीसरा गाड़ियां खड़ी कर चैन से सोने के लिये. हो सकता है कि इसमें सत्यता हो और इससे लाभ भी हो, लेकिन क्या यह मध्य-युगीन किलेबन्दी की तरह नहीं है. अलग कबीला, अलग चारदीवारी. मैं जिन सड़कों पर घन्टों घूमा करता था, अब उनमें जाते हुये भी डर लगता है कि कहां से चौकीदार प्रकट हो जाये और पूछ बैठे कि कैसे हिम्मत हुई इस सड़क पर आने की. और फिर यह कानून सम्मत भी नहीं है, सार्वजनिक प्रयोग की एक सड़क को, कुछ चन्द लोग मिलकर बन्द कैसे कर सकते हैं जिसे बनाया सरकार या नगर विकास प्राधिकरण द्वारा गया है और जिसका रखरखाव भी सरकार करती है. लेकिन भेड़चाल के इस युग में किया भी क्या जा सकता है, प्लास्टिक पीट कर भड़ास निकालने के अलावा.

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