नेताओं की सुरक्षा का सवाल

नेता बड़े चिन्तित हैं कि गृह मन्त्री चिदम्बरम कुछ नेताओं की सुरक्षा में कमी करने के निकट हैं. लालू और मुलायम विशेषत: बहुत चिन्तित हैं कि उनकी सुरक्षा में कमी न हो जाये, दोनों नेता संसद में कह रहे थे कि यदि उनकी सुरक्षा हटाई जाती है और उन पर कोई खतरा होता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी. पांच सौ चालीस सांसदों पर लगभग छ: सौ करोड़ रुपये खर्चा उनकी सुरक्षा पर होता है. एक गरीब देश जहां एक आम आदमी को बीस रुपये रोज से भी कम पर गुजारा करना पड़ता है वहां इन पांच सौ चालीस लोगों पर इतना खर्च करना विलासिता ही है. कांग्रेस के एक नेता का यह भी कहना था कि नेता आतंकवाद, नक्सलवाद के खिलाफ बोलते हैं, काम करते हैं तो उनके लिये सुरक्षा दिया जाना बहुत आवश्यक है. लेकिन उन पुलिसवालों को कौन सी सुरक्षा दी जाये जो बेचारे यह जानते हुये भी कि नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों में जाने पर न जाने क्या पता किस बारूदी सुरंग पर या किस गोली पर उनका नाम लिखा हो, इन क्षेत्रों में नक्सलियों का मुकाबला करने हेतु जाते हैं. उनकी सुरक्षा के लिये क्या किया जाता है, उन्हें तो एक ढ़ंग की बुलेटप्रूफ जैकेट भी उपलब्ध नहीं होती. उन्हें बुलेटप्रूफ वाहन और आधुनिक हथियार भी मुहैया नहीं कराये जाते. उन नागरिकों को कौन सुरक्षा मुहैया करायेगा जिनके परिजन आतंकवादी वारदातों में मारे गये. नेता को सुरक्षा चाहिये, जनता को नहीं. आखिर कानून-व्यवस्था इतनी लचर क्यों है कि हर नेता को सुरक्षा की आवश्यकता पड़ रही है. आजादी के साठ साल बाद भी आम आदमी सुरक्षित नहीं है. यदि एक आम आदमी आजादी के साठ साल बाद भी अपने आप को सुरक्षित नहीं समझता तो यह शर्म का विषय है और नेताओं की असफलता है. अधिकांश नेता मात्र स्टेटस सिम्बल के तौर पर सिक्योरिटी ताम-झाम का दिखावा करने में अपना बडप्पन समझते हैं. यहां तक तो गनीमत है लेकिन अपराधी से राजनीतिबाज बने लोग जब सिक्योरिटी की मांग करते हैं और सिक्योरिटी पाने में सफल भी रहते हैं. बहरहाल मुर्दे का वजन बाल काटने से कम नहीं होता. सिक्योरिटी में कटौती के साथ ही तमाम अन्य खर्चों पर भी रोक लगाई जानी चाहिये चाहे वह सांसदों-नेताओं के साथ हो या अधिकारियों के साथ.

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