धार्मिक स्थल और बिजली की व्यवस्था

अल्पसंख्यकों का एक धार्मिक स्थल है. आजकल उसमें एक कार्यक्रम चल रहा है. लगभग आधा किलोमीटर तक सड़क के दोनों ओर बल्ब और ट्यूब लाइटें लगी हुई हैं. तकरीबन सौ ट्यूब लाइटें और पांच सौ बल्ब लगे होंगे अर्थात पैंतीस-छत्तीस यूनिट प्रतिघंटा. यदि दस घंटा प्रति दिन के हिसाब से जोड़ा जाये तो तीन सौ पचास यूनिट प्रतिदिन तथा पांच दिनों में एक हजार सात सौ यूनिट. मजे की बात यह कि बिजलीघर, थाना तथा तहसील और मन्त्री निवास पास में. इन बल्ब और ट्यूब लाइटों के लिये सीधे ही बिजली के खम्भे से सप्लाई मिलती है, किसी को दिखाई नहीं देता. यह किस दायरे में आता है?? ऐसा भी नहीं है कि अन्य धर्मों वाले ऐसा नहीं करते जिसे जब भी मौका मिलता है बिजली विभाग पर यह मेहरबानी कर देता है और उन्हें भी पुण्य का भागीदार बना देता है। एक तो वैसे ही व्यापारी सडकों को घेर लेते हैं, कुछ वर्ष पहले तक जो नालियाँ दिखाई देती थीं, आज वह ईमानदारी की तरह गायब हो चुकी हैं, अब जो भी सड़क का हिस्सा बाकी रह जाता है, ये पुण्य बांटने वाले उन पर खम्भे गाड़ने के लिए गड्ढे कर देते हैं। इसके बाद खम्भों पर झालरें टांग दी जाती हैं। यदि कोई राहगीर धोखे से इनसे टकरा जाए और खुदा-न-खास्ता इनको कोई नुकसान हो जाता है तो फिर उसका मालिक ऊपर वाला ही है। सड़क पर किए गए गड्ढों को भरने के बारे में फिर इनकी कोई जिम्मेदारी नहीं होती । बस पुण्य कमाना ही इनका मकसद होता है। बाकी इनके लाउड-स्पीकर से किसी को कोई परेशानी हो, जुलुस से बीमारों को असुविधा हो, लोग समय से अपने घर, दफ्तर न पहुँच पायें, इनकी बला से। यद्यपि कबीर दास ने कह भी रखा है "कंकर पाथर जोरि के ........." लेकिन भारतीय लोकतंत्र में कुछ भी सम्भव है, लोक की सुविधा और मंगल को छोड़ कर।

Comments

Popular posts from this blog

एक सलाह मजबूरी पर...

कुछ पुरानी यादें