क्या यह प्रायोजित भ्रष्टाचार और राष्ट्रीय शर्म नहीं है???

अभी पेट्रोल के दाम चार रुपये लीटर और डीजल के दो रुपये प्रति लीटर बढे़. आटो एल०पी०जी० और सी०एन०जी० के दामों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई. इस बढ़ोत्तरी का मतलब हुआ कि पेट्रोल के दाम लगभग दस प्रतिशत तथा डीजल के दाम छ: प्रतिशत बढ़े. अब इस देश में मुनाफाखोरी का अंदाजा इस बात से लगाइये कि वैध-अवैध एल०पी०जी० से चलने वाले आटो के मालिकों ने उस दूरी दो किमी० का किराया आठ रुपये कर दिया जिसका किराया पहले पांच रुपये था. प्रति सवारी तीन रुपये की वृद्धि! अर्थात साठ प्रतिशत की वृद्धि, यदि एक आटो दस सवारी ढोता है तो तीस रुपये का सीधा फायदा, जबकि उसकी रनिंग कास्ट पर कोई अन्तर नहीं पड़ा, यदि आटो पेट्रोल से चलता है तो दो किमी० पर यह वृद्धि मात्र एक रुपये हुई और इसे अगर दस से भाग दें तो यह दस पैसे प्रति सवारी बैठी. यानि दस पैसे कीमत बढ़ी और अधिक वसूले गये तीन सौ पैसे, तीस गुना अधिक. क्या यह चोरी-डकैती-भ्रष्टाचार नहीं है? आखिर इस चोर-डकैती-भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई कानून क्यों नहीं है? सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था का यही आलम है, जिसकी गाज सीधे-सीधे अंतिम उपभोक्ता अर्थात आम आदमी पर गिरती है. मंहगाई का सूचकांक निगेटिव एक दशमलव पांच पांच पहुंच चुका है, लेकिन महंगाई बढ़ रही है, सत्तर रुपये रोज पाने वाला मजदूर क्या खायेगा??? यही राष्ट्रीय शर्म है!

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