मुजफ्फरनगर में पुलिस हिरासत में मौत
भारत की पुलिस कभी नहीं सुधरेगी. देहरादून में रणवीर के एन्काउंटर के मामले को अभी दस दिन भी नहीं हुये थे कि उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक अन्य व्यक्ति की पुलिस हिरासत में मौत हो गई. पता नहीं क्या खासियत है भारतीय पुलिस में कि जब कोई नेता हिरासत में लिया जाता है तो उसकी तबियत तुरन्त गड़बड़ हो जाती है और फिर उसे यही पुलिस वाले अस्पताल में भर्ती करा देते हैं. लेकिन जब किसी गरीब को हिरासत में लिया जाता है तो कई मामलों में वह थाने-हवालात में आत्महत्या कर लेता है या फिर उसकी तबियत खराब हो जाती है और अस्पताल ले जाने तक उसकी मौत हो जाती है. आपको ध्यान होगा कि उत्तर प्रदेश में इन्डियन जस्टिस पार्टी के उम्मीदवार ने अपनी हत्या की आशंका जताई थी जो सच भी हुई और पुलिस उसे अन्त तक आत्महत्या का मामला बताती रही. आगे इसमें क्या हुआ, पता नहीं. भारतीय पुलिस अपने लिये सबसे ऊपर समझती है तथा न्यायाधीश की भूमिका अपनाती है. जब पुलिस ही गलत काम करेगी तो उसे कौन पकड़ेगा. कुछ लोग कह सकते हैं कि यहां भी अपवाद हो सकते हैं, कुछ लोगों के गलत होने के कारण सब को गलत नहीं कहा जा सकता, किन्तु पुलिस-प्रशासन, चिकित्सक और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों के लिये अपवादों का होना भी समाज के लिये वांछनीय नहीं है. यह ऐसे पेशे हैं जहां गलती और गलत व्यक्तियों के लिये शून्य प्रतिशत गुंजाइश नहीं है. रणवीर के मामले में भी पुलिस का रवैया ऐसा रहा कि वह रणवीर को ही गलत ठहराने की कोशिश करती रही. यदि रणवीर के इरादे सही नहीं भी थे तब भी यह अधिकार किसने पुलिस को दे दिया कि वह हिरासत में लेने के बाद किसी अपराधी की भी हत्या कर दे. यदि वास्तव में पुलिस की मंशा इतनी ही बढ़िया होती तो दाऊद, अबू सलेम, अन्ना, शहाबुद्दीन, बबलू श्रीवास्तव जैसे अपराधी इस दुनिया में दिखाई न देते. अभी तक दोषी पुलिस वाले छुट्टा घूम रहे हैं, अगर कोई आम आदमी हत्या कर दे तो अपराधी और पुलिस वाला कर दे तो? जांच सीबीआई के हवाले तो कर दी गयी है, लेकिन सीबीआई द्वारा प्रस्तुत कितने हाई-प्रोफाइल मामलों में सजा हुई है, यह देखना भी दिलचस्प रहेगा. जब तक हिरासत में मौत तथा फर्जी एन्काउन्टर की जिम्मेदारी जिले के पुलिस प्रमुख की निर्धारित नहीं होती यह सब-कुछ ऐसे ही चलता रहेगा. हिरासत में मौत तथा फर्जी एन्काउन्टर होने पर इन मामलों में लिप्त अपराधियों को सेवा से अविलम्ब बर्खास्त किया जाना चाहिये तथा साथ ही जिले के पुलिस प्रमुख की वार्षिक गोपनीय आख्या में इसकी प्रविष्टि होना चाहिये तथा आने वाले पांच सालों तक उसकी वार्षिक वेतन वृद्धि क्युमुलेटिव प्रभाव से तथा इस अवधि के दौरान उसके वेतन का अपग्रेडेशन तथा पदोन्नति रोका जाना चाहिये. क्योंकि जब तक पुलिस प्रमुखों के कैरियर पर आंच नहीं आयेगी, वे पुलिस का मनोबल गिरने से रोकने के नाम पर अपने मातहतों को बचाते रहेंगे और इस तरह के मातहतों का मनोबल बढ़ता रहेगा.
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