एड्स के बारे में कुछ थोड़ा सा
एच0आइ0वी0 या साधारण भाषा में कहा जाये तो एड्स भारत में एक महामारी का रूप लेता चला जा रहा है। एच0आइ0वी0 अर्थात ह्रूमन इम्यूनोडिफिसियेंसी वाइरस अपने आप में कोई बीमारी नहीं है लेकिन यह वाइरस जिस मनुष्य के अन्दर प्रवेश कर जाता है उस मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट कर देता है, जिससे कि अन्य किसी भी साधारण बीमारी के कीटाणुओं के प्रवेश करने पर उस मनुष्य के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जाती है, परिणामत: वह शरीर उस साधारण बीमारी को नष्ट नहीं कर पाता और एक साधारण बीमारी लाइलाज बन जाती है तथा अन्तत: मनुष्य को मृत्यु के घाट उतार देती है। और एक कटु मगर भयावह सत्य यह भी है कि इस भयानक वाइरस का अभी तक कोई निदान नहीं खोजा जा सका है। भारत में एड्स से पीड़ित मनुष्यों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, मूलत: इस भयावह वृद्धि के मूल में इस रोग के प्रति अज्ञानता, गरीबी, लालच, स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में कमी, नैतिकता में गिरावट इत्यादि शामिल हैं।
यह रोग एच0आइ0वी0 से प्रदूषित रक्त का प्रयोग करने पर, संक्रमित व्यक्ति से यौन संबंध बनाने पर, संक्रमित औजारों जैसे इंजेक्शन हेतु सुई, दाढ़ी बनाने के लिये ब्लेड, कैंची इत्यादि तथा चिकित्सा में उपयोग लाये जाने वाले संक्रमित उपकरणों के प्रयोग से, संक्रमित माता से बच्चे में पहुँचता है। अज्ञानता के कारण भारत में एड्स मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, लोगों को इस बीमारी के बारे में ज्ञान ही नहीं है, नाई की दुकान पर देखा जा सकता है कि एक ही ब्लेड और एक ही उस्तरे से कई लोगों की हजामत बनाई जाती है। सरकारी अस्पतालों में, विशेषत: ग्रामीण क्षेत्रों में झोलाछाप डाक्टरों को एक ही सीरिंज से कई लोगों को इंजेक्शन देते हुये देखा जा सकता है। और तो और शहरी क्षेत्रों में भी बिना स्टर्लाइज किये हुये अथवा पूर्ण रूप से स्टर्लाइज किये बिना सीरिंज इत्यादि उपकरणों का प्रयोग देखा जा सकता है। चूँकि लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरुकता नहीं है अत: भोले-भाले लोग इस बीमारी के शिकार बनते जा रहे हैं।
यह भी देखा गया है कि अधिक लाभ कमाने के लालच में कुछ लोग प्रयोग की गई सीरिंज को पुन: पैक करके बेच देते हैं, कुछ वर्ष पहले एक टी0वी0 चैनल ने ऐसी प्रयोग की गयी सीरिंजों को खरीद कर दिखाया था। कूड़े के ढ़ेर मे बिखरी पड़ी हुई नीडिलें किसी भी शहर में देखी जा सकती हैं।अधिकतर अस्पतालों में प्रयोग की गई सीरिंजों/सुइयों को नष्ट करने का कोई उपकरण स्थापित नहीं किया जाता है, जबकि इस प्रकार के प्रयुक्त पदार्थों को नष्ट करने हेतु इन्सीनेटर नामक उपकरण उपलब्ध है, किन्तु सरकारी अस्पतालों में यह उपकरण बजट न होने के कारण नहीं लगाया जाता और निजी चिकित्सक अपने अस्पतालों के लिये कमाई करने वाले अन्य मँहगे से मँहगे उपकरण तो खरीद सकते हैं लेकिन एक इन्सीनेटर नहीं लगा सकते क्योंकि उससे उन्हें कमाई नहीं होती। जाहिर है कि अस्पतालों से निकला हुआ यह कचरा न केवल एड्स बल्कि कई अन्य घातक बीमारियों का वाहक बनता है।
एड्स फैलने का एक बड़ा कारण संक्रमित खून का प्रयोग है, जटिल आपरेशनों के दौरान अथवा दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल मरीजों के लिये रक्त चढ़ाना आवश्यक हो जाता है, ऐसे में संक्रमित रक्त का प्रयोग एड्स रोगियों की संख्या बढ़ाने में सहायक हो रहा है। यहाँ भी जागरुकता न होने के कारण लोग रक्तदान करने में संकोच करते हैं, ऐसे में रक्त का इंतजाम ब्लड बैंकों से किया जाता है, जहाँ रक्तदान करने वालों में अधिकतर पेशेवर रक्तदाता ही होते हैं, जिनके विभिन्न रोगों से ग्रस्त होने की संभावना अधिक होती है, साथ ही ज्यादा लाभ कमाने की चाहत में ब्लड बैंकों में रक्त का संपूर्ण परीक्षण नहीं किया जाता जिससे कि रक्त के अशुद्ध व संक्रमित होने की संभावना बढ़ जाती है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कई ऐसी घटनायें प्रकाशित हो चुकी हैं जब रक्त के परीक्षण में बरती गई लापरवाही के कारण लोगों को एड्स हो गया।
समाज में बढ़ती अनैतिकता जिसमें सैटेलाइट टी0वी0 का बहुत बड़ा योगदान है, इसके द्वारा दिखाये जाने वाले धारावाहिकों में विवाहेतर संबंधों को महिमा-मंडित किया जा रहा है, इस का एक अप्रत्यक्ष माध्यम है। आजकल टी0वी0 चैनलों में दिखाये जाने वाले उत्तेजक वीडियो गाने केवल और केवल सेक्स को बढ़ावा दे रहे हैं, लोग भी इन धारावाहिकों, फिल्मों से शिक्षा ग्रहण कर एक से अधिक व्यक्तियों से यौन संबंध बनाना चाहते हैं। समाज में बढ़ती हुई अश्लीलता के चलते लोग अपने यौन दुराग्रहों की पूर्ति के लिये वेश्यागमन से भी परहेज नहीं करते। और वेश्यालय अपने आप में एड्स को बढ़ाने में अत्यधिक सहायक सिद्ध हो रहे हैं। विगत दिनों एक एन0जी0ओ0 ने ट्रक-ड्राइवरों को तथा कुछ रेड लाइट इलाकों में कंडोम बाँटे थे। ट्रक-ड्राइवर अपने घर से दूर रहने के कारण राज-मार्गों पर स्थित वेश्यालयों में अपनी यौनेच्छा पूर्ति करते हैं, यहाँ भी एड्स के विषय में अज्ञानता एड्स के फैलाव में सहायक बनती है। असुरक्षित यौन संबंध एड्स के प्रसार में अद्वितीय भूमिका निभा रहे हैं।
चूँकि इस भयावह बीमारी का अभी तक कोई निदान नहीं मिल सका है, इसलिये यह अत्यन्त आवश्यक हो जाता है कि इस बीमारी के कारण और इससे बचाव का प्रचार व्यापक पैमाने पर किया जाये। हालाँकि सरकारी और गैर-सरकारी संगठन एड्स के बारे में प्रचार तो कर रहे हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है, मात्र कुछ विज्ञापन दिखाकर और कुछ एक पोस्टर छपवाकर इस बीमारी का मुकाबला नहीं किया जा सकता। अत: सरकारों का यह दायित्व हो जाता है कि वह युद्ध स्तर पर लोगों में इस रोग के प्रति जागरुकता उत्पन्न करने हेतु अभियान चलाये, जिसमें गैर सरकारी संस्थाओं, छात्रों व अध्यापकों, स्कूल-कालेजों, सरकारी व गैर सरकारी चिकित्सालयों तथा सरकारी एवं निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की सहायता ली जाये। समस्त चिकित्सालयों में इन्सीनेटर लगाना अनिवार्य किया जाये एवं विभिन्न प्रचार माध्यमों का उपयोग और अधिक आक्रामक रूप से किया जाये अन्यथा एड्स भारत में एक महामारी का रूप ले लेगा।
यह रोग एच0आइ0वी0 से प्रदूषित रक्त का प्रयोग करने पर, संक्रमित व्यक्ति से यौन संबंध बनाने पर, संक्रमित औजारों जैसे इंजेक्शन हेतु सुई, दाढ़ी बनाने के लिये ब्लेड, कैंची इत्यादि तथा चिकित्सा में उपयोग लाये जाने वाले संक्रमित उपकरणों के प्रयोग से, संक्रमित माता से बच्चे में पहुँचता है। अज्ञानता के कारण भारत में एड्स मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, लोगों को इस बीमारी के बारे में ज्ञान ही नहीं है, नाई की दुकान पर देखा जा सकता है कि एक ही ब्लेड और एक ही उस्तरे से कई लोगों की हजामत बनाई जाती है। सरकारी अस्पतालों में, विशेषत: ग्रामीण क्षेत्रों में झोलाछाप डाक्टरों को एक ही सीरिंज से कई लोगों को इंजेक्शन देते हुये देखा जा सकता है। और तो और शहरी क्षेत्रों में भी बिना स्टर्लाइज किये हुये अथवा पूर्ण रूप से स्टर्लाइज किये बिना सीरिंज इत्यादि उपकरणों का प्रयोग देखा जा सकता है। चूँकि लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरुकता नहीं है अत: भोले-भाले लोग इस बीमारी के शिकार बनते जा रहे हैं।
यह भी देखा गया है कि अधिक लाभ कमाने के लालच में कुछ लोग प्रयोग की गई सीरिंज को पुन: पैक करके बेच देते हैं, कुछ वर्ष पहले एक टी0वी0 चैनल ने ऐसी प्रयोग की गयी सीरिंजों को खरीद कर दिखाया था। कूड़े के ढ़ेर मे बिखरी पड़ी हुई नीडिलें किसी भी शहर में देखी जा सकती हैं।अधिकतर अस्पतालों में प्रयोग की गई सीरिंजों/सुइयों को नष्ट करने का कोई उपकरण स्थापित नहीं किया जाता है, जबकि इस प्रकार के प्रयुक्त पदार्थों को नष्ट करने हेतु इन्सीनेटर नामक उपकरण उपलब्ध है, किन्तु सरकारी अस्पतालों में यह उपकरण बजट न होने के कारण नहीं लगाया जाता और निजी चिकित्सक अपने अस्पतालों के लिये कमाई करने वाले अन्य मँहगे से मँहगे उपकरण तो खरीद सकते हैं लेकिन एक इन्सीनेटर नहीं लगा सकते क्योंकि उससे उन्हें कमाई नहीं होती। जाहिर है कि अस्पतालों से निकला हुआ यह कचरा न केवल एड्स बल्कि कई अन्य घातक बीमारियों का वाहक बनता है।
एड्स फैलने का एक बड़ा कारण संक्रमित खून का प्रयोग है, जटिल आपरेशनों के दौरान अथवा दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल मरीजों के लिये रक्त चढ़ाना आवश्यक हो जाता है, ऐसे में संक्रमित रक्त का प्रयोग एड्स रोगियों की संख्या बढ़ाने में सहायक हो रहा है। यहाँ भी जागरुकता न होने के कारण लोग रक्तदान करने में संकोच करते हैं, ऐसे में रक्त का इंतजाम ब्लड बैंकों से किया जाता है, जहाँ रक्तदान करने वालों में अधिकतर पेशेवर रक्तदाता ही होते हैं, जिनके विभिन्न रोगों से ग्रस्त होने की संभावना अधिक होती है, साथ ही ज्यादा लाभ कमाने की चाहत में ब्लड बैंकों में रक्त का संपूर्ण परीक्षण नहीं किया जाता जिससे कि रक्त के अशुद्ध व संक्रमित होने की संभावना बढ़ जाती है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कई ऐसी घटनायें प्रकाशित हो चुकी हैं जब रक्त के परीक्षण में बरती गई लापरवाही के कारण लोगों को एड्स हो गया।
समाज में बढ़ती अनैतिकता जिसमें सैटेलाइट टी0वी0 का बहुत बड़ा योगदान है, इसके द्वारा दिखाये जाने वाले धारावाहिकों में विवाहेतर संबंधों को महिमा-मंडित किया जा रहा है, इस का एक अप्रत्यक्ष माध्यम है। आजकल टी0वी0 चैनलों में दिखाये जाने वाले उत्तेजक वीडियो गाने केवल और केवल सेक्स को बढ़ावा दे रहे हैं, लोग भी इन धारावाहिकों, फिल्मों से शिक्षा ग्रहण कर एक से अधिक व्यक्तियों से यौन संबंध बनाना चाहते हैं। समाज में बढ़ती हुई अश्लीलता के चलते लोग अपने यौन दुराग्रहों की पूर्ति के लिये वेश्यागमन से भी परहेज नहीं करते। और वेश्यालय अपने आप में एड्स को बढ़ाने में अत्यधिक सहायक सिद्ध हो रहे हैं। विगत दिनों एक एन0जी0ओ0 ने ट्रक-ड्राइवरों को तथा कुछ रेड लाइट इलाकों में कंडोम बाँटे थे। ट्रक-ड्राइवर अपने घर से दूर रहने के कारण राज-मार्गों पर स्थित वेश्यालयों में अपनी यौनेच्छा पूर्ति करते हैं, यहाँ भी एड्स के विषय में अज्ञानता एड्स के फैलाव में सहायक बनती है। असुरक्षित यौन संबंध एड्स के प्रसार में अद्वितीय भूमिका निभा रहे हैं।
चूँकि इस भयावह बीमारी का अभी तक कोई निदान नहीं मिल सका है, इसलिये यह अत्यन्त आवश्यक हो जाता है कि इस बीमारी के कारण और इससे बचाव का प्रचार व्यापक पैमाने पर किया जाये। हालाँकि सरकारी और गैर-सरकारी संगठन एड्स के बारे में प्रचार तो कर रहे हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है, मात्र कुछ विज्ञापन दिखाकर और कुछ एक पोस्टर छपवाकर इस बीमारी का मुकाबला नहीं किया जा सकता। अत: सरकारों का यह दायित्व हो जाता है कि वह युद्ध स्तर पर लोगों में इस रोग के प्रति जागरुकता उत्पन्न करने हेतु अभियान चलाये, जिसमें गैर सरकारी संस्थाओं, छात्रों व अध्यापकों, स्कूल-कालेजों, सरकारी व गैर सरकारी चिकित्सालयों तथा सरकारी एवं निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की सहायता ली जाये। समस्त चिकित्सालयों में इन्सीनेटर लगाना अनिवार्य किया जाये एवं विभिन्न प्रचार माध्यमों का उपयोग और अधिक आक्रामक रूप से किया जाये अन्यथा एड्स भारत में एक महामारी का रूप ले लेगा।
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