सरकारी कर्मचारी घूस क्यों न ले.

सरकारी कर्मचारी घूस क्यों न लें- शीर्षक बुरा लग सकता है और है. लेकिन क्या सरकारी कर्मचारी द्वारा पद का दुरुपयोग कर पैसा लेना ही भ्रष्टाचार है? जब चीनी मिलों ने चीनी का दाम अठारह रुपये से अठ्ठाइस रुपये पहुंचा दिया तो दस रुपये की यह मूल्य वृद्धि कैसे जायज थी और किस प्रकार सरकारों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की. डीजल में दो रुपये प्रति लीटर की वृद्धि होने पर जब निजी बस/आटो वाले प्रति सवारी दो रुपये प्रति किलोमीटर की वृद्धि कर दी जाती है. ट्रकों और बसों के किराये में दस प्रतिशत की वृद्धि कर दी जाती है. सब्जियों, दालों के भाव आसमान छूने लगते हैं. वह दाल जिसका दाम किसान को पच्चीस से तीस रुपये किलो दिया जाता है, सौ रुपये तक कैसे पहुंच जाती है. किसान ने तो जमाखोरी नहीं की, क्योंकि उसके पास जमा करने के लिये कोई व्यवस्था है ही नहीं. न ही वह आर्थिक रूप से इतना मजबूत होता है कि अपनी फसल का स्टाक कर सके. छोटे और मझोले किसान को तो अपनी फसल (यदि वह बाढ़-सूखे और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से बच गयी तो) को तुरन्त निकालना ही होता है जिससे वह अपने परिवार का पेट पाल सके और अपने कर्जों को निपटा सके. फिर यह जमाखोरी कौन करते हैं, यह किसे पता नहीं. दालें तो वही हैं जो पिछले सीजन में किसानों ने बेची हैं. फिर इनके भावों में तेजी कैसे आ गयी. स्पष्ट है कि जमाखोरों ने नकली अभाव पैदा कर दिया है और अब मनमाने दामों में बेच रहे हैं. क्या इन बातों की खबर सरकार को नहीं है? बिल्कुल है, लेकिन वह कार्रवाई करे भी तो कैसे और क्यों करे. पार्टियों को चंदा कौन देता है बड़े उद्योगपति, बड़े लाला, बड़े बिल्डर. लिहाजा सुनी किसकी जायेगी, बिल्डरों की, लालाओं की और उद्योगपतियों की न कि वोट देने वाली गरीब जनता की. मूर्ख बनाने के तरीके अलग-अलग. अधिक समझदार पैकिंग में दस प्रतिशत की कमी कर देता है और दाम पुराने रखता है, लोगों को पता ही नहीं चलता कि उसकी जेब कट गयी. उसके बाद अगले प्रकार का समझदार क्वालिटी में समझौता कर लेता है, तीसरी प्रकार का समझदार सीधे ही कीमत बढा़ देता है. लोग अलग, समझदारी अलग. पहले नेता और उद्योगपति अलग होते थे, अब तो उद्योगपति नेता बनने लगे हैं और नेता उद्योगपति, बिल्डर, लाला में. सरकार जिनसे बनती है वह उद्योगपति, लाला, बिल्डर बन गये हैं या कहिये उद्योगपति, लाला, बिल्डर सरकार बन गये हैं. सरकार सरकार के विरुद्ध कैसे कार्रवाई करे? मिलावट, घटतौली, दामों में अनाप-शनाप बढो़त्तरी, पुलिस-प्रशासन का पक्षपात, क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है? फिर सरकारी कर्मचारियों के द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार के साथ इन सब चीजों को भी भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में क्यों नहीं जोड़ा जाता? कल ही एक विज्ञापन था एक प्रख्यात ग्रुप द्वारा बनाये गये फ्लैटों के सम्बन्ध में- बुकिंग प्रारम्भ - कीमत मात्र २४ लाख से प्रारम्भ. आखिर भारत तरक्की जो कर रहा है.

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