अब आप भी पुलिस की कुर्सी पर बैठ सकते हैं.

अब आप भी पुलिस अधीक्षक की कुर्सी पर बैठ सकते हैं. यह मजाक नहीं है, बिल्कुल सत्य है. मेरी बात न मानें तो औरेया के पुलिस अधीक्षक से पूछ लीजिये. घटना एक दिन पुरानी है. इन्जीनियर मनोज गुप्ता की याद है आपको जिनके कत्ल का मुख्य आरोपी है विधायक शेखर तिवारी. इसी हत्याकांड में दिबियापुर के थानाध्यक्ष होशियार सिंह की भूमिका संदेहास्पद थी और बाद में इसे भी आरोपी बनाया गया. बाद में इसे बर्खास्त भी किया और इसकी गिरफ्तारी पर तीस हजार इनाम भी घोषित किया गया. पुलिस की नौटंकी देखिये कि एक वांछित अपराधी शान से आता है, थाने में आत्मसमर्पण करता है और फिर बैठने के लिये उसे थानाध्यक्ष की कुर्सी मुहैया कराई जाती है. एक हत्यारोपी के साथ इतना अच्छा व्यवहार, मानवाधिकारों का हर रोज उल्लंघन करने वाली पुलिस इतनी उदार हो गयी कि सलाखों के पीछे धकेलने की जगह थानाध्यक्ष की कुर्सी उपलब्ध कराई गयी. बाद में पुजारी महोदय थाने के अन्दर ही उसे प्रसाद देते नजर आते हैं, यह आरोपी आरती करता है. वाह, पुलिस का यह रूप कितना सुन्दर है. पुलिस अधीक्षक से पूछने पर जवाब मिलता है कि कुर्सी कुर्सी सब एक सी, यह भी सरकारी, वह भी सरकारी. किस पर कौन बैठ गया या किसे बिठाया गया, यह कोई बड़ी बात नहीं है. इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आप भी पुलिस अधीक्षक की कुर्सी पर जाकर बैठ सकते हैं, क्योंकि उनके अनुसार कुर्सी-कुर्सी सब सरकारी कुर्सी. उनमें फर्क कैसा. जिस जगह अपराधी की हैसियत देखकर उससे व्यवहार किया जाता है, उससे अन्दाजा लगाया जाता है कि न्याय किसे और कैसे मिलता होगा. इससे पहले रीता जोशी के घर पर हुई आगजनी में भी देखा जा सकता था कि उस जगह पुलिस वालों की कितनी बड़ी भूमिका थी. किस प्रकार से पुलिस के अधिकारी वहां खड़े हुए थे. पुलिस वालों का पक्षीय रूप में काम करना कोई नई बात नहीं है. जब एक पार्टी की सरकार होती है तो यही पुलिस वाले दूसरी पार्टी वालों पर लाठी चटकाते हुये नजर आते हैं और जब दूसरी पार्टी की सरकार होती है तो उसके इशारे पर पहली पार्टी वालों पर लाठी तोड़ते हैं. इनके दोनों हाथों में लड्डू होते हैं. और जब कभी इनके फंसने का खतरा होता है तो अव्वल तो इनके राजनीतिक आका इन्हें बचा लेते हैं और यदि आका सत्ता से बाहर होते हैं तो यह अपने जनेऊ के जरिये मतलब पुलिसिया बिरादरान के जरिये बच जाते हैं. कम से कम इस प्रकार की पुलिस व्यवस्था के चलते भारत में तो पुलिस की भूमिका ऐसी ही रहेगी. वह तिल को ताड़ बनाती रहेगी. हर वर्ष न जाने कितनी फर्जी मुठभेड़े होती हैं, न जाने कितने लोगों की मृत्यु पुलिस प्रताड़ना से हो जाती है और उन पर न्यायिक जांच बिठा दी जाती है. लेकिन आश्चर्य का विषय है कि इनमें से अधिकांश जांचे कई कई सालों तक चलती ही रहती हैं, उत्तराखंड इसका ज्वलंत उदाहरण है, दोषियों को सजा और शिकार को न्याय मिलना तो बहुत दूर की बात है.

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