समस्या नक्सली नहीं, समस्या स्वयं सरकारें हैं.

फिर नक्सलियों ने गढ़ चिरौली, महाराष्ट्र में सत्तरह पुलिसवालों को मार डाला. फिर वही कवायद, फिर वही बयानबाजी और फिर शोक-सभा-श्रद्धान्जलि का सिलसिला. फिर निन्दा, फिर कड़ी कार्रवाई का आश्वासन, फिर फोटो में गमगीन दिखने का स्वांग करते नेता दिखाई देंगे. फिर मीडिया में दो दिन तक छाया रहेगा ये मुद्दा, हालांकि मीडिया का भी अपना नफा-नुकसान का आकलन होता है. असम की हिंसा पे चार आंसू नहीं बहाये गये, मिरज के दंगे मीडिया को नहीं भाये, आखिर उनमें गुजरात जैसी बात कहां. तकरीबन असम में भी मृतकों की यही तादाद थी. खैर, मैं कह रहा था कि समस्या नक्सली नहीं सरकारें हैं. कैसे? लेकिन इस शीर्षक से यह मत मान लीजिये कि मैं नक्सलियों या हिंसा का समर्थक हूं. अधिक कुछ लिखने की जरूरत नहीं, कुछ चीजें आपके सामने प्रस्तुत करता हूं. मन्त्री जी एक लाख रुपये रोज के होटल में ठाठ से रहते हैं जबकि करोडों व्यक्तियों को छत नसीब नहीं. कुछ तो ऐसे हैं जो कुल्ला भी स्काच से करते हैं और करोडो़ के लिये पीने का पानी भी मयस्सर नहीं. कुछ के लिये तो नगन जड़ाती थीं वे नगन जड़ाती हैं, स्वसिद्ध है. कहीं सत्ता महारानी का वरदहस्त पाते ही कंगाल अरबपति हो गये तो कहीं लोगों को बीस रुपये से कम पर गुजारा करना पड़ता है. अभी भी ऐसे लोग हैं जिन्होंने बस-ट्रेन का मुंह नहीं देखा. अभी भी लोग गुरबत में मरने के लिये मजबूर हैं. समस्या यह है कि जिन्हें सबसे अधिक जिम्मेदार होना चाहिये वे सबसे ज्यादा गैर जिम्मेदार हैं. गंगा नीचे से ऊपर नहीं जाती, ऊपर से नीचे आती है. असल बात यह है कि इस देश में भागीदारी किसी ने नहीं की सिर्फ अपना-अपना भाग ले लिया, अगर ऐसा न होता तो स्विस बैंकों में हम टाप न कर पाते. देश के कृषि मन्त्री का पहला बयान चीनी के दाम सवाया, दूसरा बयान डेढ़ गुना, तीसरा बयान दो गुना. इस महंगाई में गरीब की गुजर बसर कैसे होती होगी, मैं अन्दाजा भी नहीं लगा सकता. दलितों के घर खाना खाना भी अब फैशन बन गया है. दो सौ रुपये मजदूर की रोज आमदनी नहीं, डाक्टर की तीन दिन की फीस हो गयी दो सौ रुपये. न्याय का कहीं अता-पता नहीं. पुलिस और प्रशासन से शुरुआत होती है न्याय की. किस अफसर और किस नेता को नहीं पता होता कि हर चौराहे पर वसूली होती है, लेकिन होता क्या है, कुछ भी नहीं. हर साल एक शपथ और चुनाव के समय भ्रष्टाचार से निजात दिलाने के वादे. और वह वादा ही क्या जिसे पूरा किया जाये. पुलिस की भूमिका भी पता ही है सबको. असली और नकली एन्काउन्टर में शायद यही फर्क होता है. फिर एक बार दोहराता हूं कि यह नक्सलियों के कृत्य का समर्थन नहीं है. आखिर नक्सली कहां से पनपे, कहां से उनको सहारा मिलता है, क्यों लोग इस विचारधारा, इस मार्ग पर चलने लगते हैं? कोई इसे जानना नहीं चाहता. अगर आज की तारीख में कोई एस-ओ करोड़पति नहीं बन सका तो उसका जीवन व्यर्थ है, यह मेरा कहना नहीं है, खुद उन्हीं लोगों का है. इस हालत में जब हर कोई लूटने में लगा है तो नक्सली क्यों न सिर उठायेंगे. सरकार और नक्सलियों की स्थिति में कोई बहुत अधिक अन्तर नहीं है. सरकार शिक्षा नहीं दे सकती, सरकार रोजी-रोटी नहीं दे सकती, सरकार पीने को पानी और खाने को अन्न नहीं दे सकती. सरकार आदमी को सुरक्षा नहीं दे सकती, सरकार न्याय मुहैया नहीं करा सकती. सरकार के इशारे पर लाठियां टूटती हैं, सरकार के इशारे पर लोगों को गोलियों से उड़ा दिया जाता है. सरकार जानवरों की तरह मजदूरों पर लाठियां तुड़वा सकती है. सरकार जान-माल की सुरक्षा नहीं कर सकती. सरकार टैक्स लगाती है, नेता और अफसर मौज करते हैं. नक्सली भी उगाही करते हैं, मौज करते हैं. सरकार अपनी न्याय व्यवस्था चलाती है नक्सली अपनी. देश में केवल चार समस्यायें हैं, सबसे पहले भ्रष्टाचार, फिर बढ़ती जनसंख्या, आसमान छूती मंहगाई और न्यायिक प्रक्रिया में दोष तथा देरी. सबका मूल फिर वही कि देश को कोई देश की नजर से देखता ही नहीं, माफ कीजियेगा बिल्कुल एक ........ जैसी स्थिति बना दी है. जो आता है नोंचता चला जाता है. जिम्मेदारी किस की?? आम आदमी की?? बिल्कुल नहीं. आम आदमी को अपने पेट की चिन्ता से ही फुर्सत नहीं, क्या कमायेगा क्या खायेगा? लोग वोट बन चुके हैं, उनका महत्व सिर्फ एक दिन का. जो सत्ता शीर्ष पर होता है जिम्मेदारी उसकी होती है, जिसके पास अधिकार होते हैं जिम्मेदारी उसकी होती है. जनता को खाने को नहीं दिया, शिक्षा नहीं दी, वह व्यक्ति पेट के अलावा क्या सोच सकता है. एक षड़यन्त्र को बड़ी खूबसूरती से अन्जाम दे दिया गया. वह समय आने में अब देर नहीं कि आप एटीएम से पैसा निकालें और दो लोग बाहर खडे होकर आपसे पैसा छीन लें. चिन्ता किसे है देश की, अपना हिस्सा ले लो और जाओ, भाड़ में जाये देश. आप मुझे एक भी नेता का नाम बताइये जिसके बेटे देश की सेवा राजनीति के माध्यम से न कर सेना में भर्ती होकर करते हैं. एक भी ठेका बताइये जिसमें कमीशन न चलता हो. एक भी सीट का नाम बताइये जहां बिना जाति-धर्म के आधार पर टिकट दिये जाते हों. वह पुलिसिया भी नक्सली है जो चौराहे पर वसूली करता है, जो निर्दोषों पर लाठियां भांजता है, बेकसूरों को गोलियों से उड़ा देता है. वह अधिकारी भी नक्सली है जो अपना काम नहीं करता, जो पक्षपात से ग्रस्त हो काम करता है, जो समय पर काम नहीं करता, जो सही काम नहीं करता. वह नेता भी नक्सली है जो वोटों की फसल उगाने के लिये देश को ठेंगे पर रखता है. दीमक चाट रही है देश को. तरीका अलग है, कोई धीरे-धीरे चाट रहा है कोई तेजी से. आजतक किसी नेता ने अपनी औलादों को भेजा है फौज में, क्यों?? कंगाल भी राजनीति में आकर अरबपति बन जाता है कैसे?? पूरे देश को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता यह फार्मूला?? हर किसी को सब कुछ मालूम है, हर कोई सब कुछ देखता है, लेकिन करता कोई नहीं. क्यों?? इस क्यों का जबाव भी हर किसी को पता है, लेकिन क्यों करे. जब पानी पन्द्रह रुपये लीटर, चीनी चालीस रुपये किलो, आलू बीस रुपये किलो और अरहर की दाल सौ रुपये किलो बिकेगी और उस पर किसान आत्महत्या करता रहेगा. लोग भूख से मरेंगे, जिलाधिकारी का बयान होगा कि भूख से नहीं बीमारी से मरा है तो उस देश में एक नक्सलवाद नहीं अनेक नक्सलवाद पैदा होते रहेंगे. इसे कोई नहीं रोक सकता. बीमारी नक्सलवाद नहीं है, बीमारी वह कैंसर है जो पिछले बांसठ साल में फैलाया गया. इलाज इस तरह से किया जा रहा है कि ऊपर मलहम पोता जा रहा है कि लक्षण दबे रहें और शरीर अन्दर ही अन्दर गल रहा है. विषवृक्ष की पत्तियां काटने का दिखावा किया जा रहा है और जड़ों में खाद दी जा रही है. नक्सलियों को गोला-बारूद कहां से मिलता है, या तो विदेशों से आता है या फिर देश में ही उपलब्ध कराया जाता है. बाहर से आया तो कैसे आया, सीमाओं पर प्रहरी हैं, घर में मिला तो कैसे मिला?? लाइसेंस, रजिस्ट्रेशन से लेकर तमाम कानूनी झमेलों से लेकर गोला-बारूद का आवागमन निर्बाध रूप से कैसे हो सकता है?? जाहिर है कि कैंसर यहां भी फैला है. फिर जब नेता करोडों-अरबों कमाते हैं तो कर्मचारी क्यों अछूते रहें. लम्बी गाडियों, बड़े बंगलों, मंहगे अपार्टमेन्टों का एक जायजा लेकर देख लीजिये, दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा. जब भ्रष्टाचार को शिष्टाचार मान लिया जायेगा तो यही होगा श्रीमान जी. स्वनामधन्य एक पत्रकार कहते हैं कि बोफोर्स तोप घोटाले में जितनी रकम का लेन-देन बताया गया था उससे कई गुना अधिक इसकी जांच में खर्च हो गया इसलिये भी इस जांच और मामले की कोई आवश्यकता नहीं. मेरा विनम्र अनुरोध है कि एक हत्या में प्रयुक्त गोली की कीमत सौ-पचास रुपये होती है और कभी कभी तो वह भी नहीं, जबकि उस हत्यारे के प्रोसीक्यूशन से लेकर सजा मुकम्मल होने तक सरकार के लाखों रुपये व्यय हो जाते हैं तो ऐसे मामले तो सिरे से ही खत्म कर दिये जाने चाहिये. वैसे भी आजादी के बाद जितनी हत्यायें हुई हैं, उनके चौथाई मामलों में भी सजा नहीं हुई है तो फिर कैसे मान लिया जाये कि देश एक असफल राष्ट्र नहीं है. समस्या नक्सली नहीं हैं, समस्या भ्रष्टाचार है, जनसंख्या में अबाध वृद्धि है, मंहगाई है, लेकिन अरण्य रोदन से क्या होने वाला?? जब तक जंगलों के नक्सलियों से या फिर शहरों के सफेदपोश नक्सलियों से बचे रह सकते हैं, बोनस मानकर चलिये.

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