पुलिस और धर्मनिरपेक्षता

मैं एक थानेदार महोदय को जानता हूं. एक निरीक्षकोचित सभी गुण हैं उनके अन्दर. बड़े कड़क हैं और काफी समृद्ध भी हो चुके हैं जिसके बारे में फिर कभी चर्चा करूंगा. इसके साथ ही सम्भवत: दो व्यक्ति उनकी हवालात में आत्महत्या (?) भी कर चुके हैं, जिससे आप उनके बारे में अन्दाजा लगा सकते हैं. लेकिन मैं इसकी भी बात नहीं कर रहा. अभी होली पर मैंने उन्हें कुछ लड़कों को लठियाते हुये देखा था जो बदतमीजी कर रहे थे. खैर मैंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि यह तो पुलिस वालों का पैदायशी हक भी है और गुण या कला जो भी कह लें. अभी मुझे उनके साथ ईद वाले दिन जाने का सौभाग्य प्राप्त हो गया. उनकी गाड़ी में जिस पर बत्ती लगी हुई थी और एक हूटर भी जो उनके या कह लें पुलिस वालों के नाजायज अधिकार दिखाने का प्रतीक है. उस दिन उन्होंने उसी चौराहे पर गाड़ी रुकवा दी जहां मैं होली वाले दिन उन्हें कुछ लड़कों को लठियाते देख चुका था. कुछ ही देर में पांच-छ: मोटर-साइकिलें बड़ी तेजी से गुजरीं जिसमें हरएक पर तीन-तीन लड़के गोल टोपी लगाये बैठे हुये थे. जाहिर था कि पहनावे से मुस्लिम लग रहे थे. चूंकि महोदय बड़े सख्त किस्म के अफसर हैं इसलिये उन्हें यह सब अनदेखा करते देखकर मुझे अटपटा लगा. मैंने बात छेड़ी तो कहने लगे अगर मैं आज इनका चालान कर देता हूं या किसी को पकड़कर दो-चार हाथ मार देता हूं तो आधे घंटे के अन्दर थाने पर हजारों की भीड़ इकठ्ठी हो जायेगी. फलां-फलां मजलिस के नेता यहां आ जायेंगे और फिर स्थानीय सभासद से लेकर मन्त्री तक इनकी हिमायत में आ जायेंगे. सीओ से लेकर आईजी तक चढ़ बैठेंगे. इनके हिमायती और नेता त्योहार का हवाला देंगे और उल्टा मुझे दोष देने लगेंगे. थाने पर तमाम लोग निगाह गड़ाये बैठे रहते हैं, इनका तो कुछ होगा नहीं और मुझे जरूर लाइन भेज दिया जायेगा. धर्मनिरपेक्षता की कलई यहीं पर खुल जाती है.

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