शशि जी शहीदों के लिये जगह बचाकर रखिये

एक-दो रोज पहले एक ब्लाग में शशि शेखर जी के बारे में यह पढ़ने को मिला कि उन्होंने समाचार पत्र में एक फौजी के शहीद होने पर लगी हुई बड़ी हेडलाइन तथा विस्तृत समाचार को यह कहकर छोटा करा दिया कि शहीद होना तो उनका काम है. यह काम उन्होंने जानबूझ कर चुना है, कहने का लब्बो-लुआब यह कि चूंकि एक फौजी की नौकरी में खतरों से खेलना जुड़ा है और मौत उसकी नौकरी का एक हिस्सा है इसलिये उसपर अनावश्यक रूप से पेज काले नहीं करने चाहिये. तमाम अन्य अच्छी बातें भी लिखी थीं शशि जी के बारे में. मुझे यह बात बहुत खटकी. उनकी यह बात ठीक हो सकती है कि मौत और शहादत एक फौजी की सेवा का अनिवार्य अंग हो सकता है. यह जानते हुये कि मौत सेना की नौकरी में कभी भी आ सकती है, लोग अपनी जीविकोपार्जन हेतु स्वेच्छा से सेना को चुनते हैं और आजकल तो बड़ी लम्बी लम्बी लाइनें लगती हैं फौज में भरती के लिये. उनकी बात सिद्धान्तत: सही हो सकती है, लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से बिल्कुल अनुचित. एक जवान जो यह जानते हुये सीमा पर खड़ा रहता है कि पता नहीं किस ओर से दुश्मन की गोली आये और उसका सीना चीरकर उसे मौत के हवाले कर दे. न जाने किस तरफ से बम-मोर्टार आकर गिरे और उसके चीथड़े उड़ा दे. यह भी ठीक हो सकता है कि सीमा पर रखवाली करना उसकी मजबूरी भी हो सकती है, लेकिन दुश्मन के आगे खड़े होने के लिये मजबूर नहीं मजबूत सीने की जरूरत होती है. मरने के बाद शहीद देखने नहीं आता कि उसके मां-बाप किस हाल में हैं, उसकी विधवा कैसे अपना जीवन गुजार रही है, उसके बच्चों की गुजर बसर कैसे होगी. शहीद के नाम दो-चार कालम लगा देने से उसके परिवार की माली हालत नहीं बदल जाती. उसके नाम एक दरवाजे का नाम रख देने से शहीद जिन्दा नहीं हो जाता. आप जानते हैं कि सीने में गोली खाने वाले अधिकतर सिपाही होते हैं, यह कहकर मैं यह नहीं कहता कि अधिकारी शहीद नहीं होते. और सिपाही किस पृष्ठभूमि से आते हैं, सभी भली-भांति वाकिफ हैं. मत दीजिये उसे अपने अखबारों में जगह, लेकिन यह कहकर उसकी शहादत को छोटा मत कीजिये.

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