इस कुर्बानी की परम्परा को क्यों नहीं रोका जाता.

अभी बकरीद थी, करोड़ों की संख्या में जानवर काट दिये गये। कुर्बानी का मतलब है त्याग, लेकिन किसका एक निर्दोष जानवर का. लोगों के खाने पीने के पीछे अनेकों तर्क हो सकते हैं, जिन पर बहस करना मेरा मकसद नहीं. लेकिन एक परम्परा के नाम पर खून बहाने का यह सिलसिला. मेरे शहर में ही मैंने खून से बजबजाती नालियां देखीं हैं. इतना वीभत्स कृत्य. मुझे पता नहीं कि यह सत्य है अथवा नहीं लेकिन यह सुनते हैं कि मुहम्मद साहब ने अपने साथियों को निहायत ही चिन्ताजनक हालातों में जब उनके पास खाने पीने के लिये कुछ भी नहीं था, तब ऊंट को मार कर खाने के लिये कहा था. पुत्र की कुर्बानी की टक्कर की कुर्बानी का माद्दा और सानी तो कोई नहीं रखता लेकिन उस परम्परा के चलते करोडों जानवर जरूर इसकी भेंट चढ़ जाते हैं. जब भी रवायतों के नाम पर जीवहत्या होती है, चाहे वह देवी के लिये बलि हो या बकरीद, मुझे बहुत तकलीफ होती है. यहां तक कि अधिकतर व्यक्ति स्वयं उन जानवरों को नहीं काट सकते जिनकी वह कुर्बानी देते हैं.

एक छोटी सी घटना जानवर के प्रेम और सम्वेदना को लेकर - मेरे घर के पास में एक कुतिया रहती थी, जिसके तीन बच्चे हुये. जिस घर के सामने वह रहती थी वहां से उसे पानी डालकर भगा दिया गया. वह उस घर के सामने वाले घर के बाहर रहने लगी. उसके एक पिल्ले को एक दिन एक टैम्पो वाला कुचल कर भाग गया. जब सुबह लोगों को वह मरा हुआ पिल्ला दिखाई दिया तो उसे ले जाकर दफन कर दिया, लेकिन उसने अपने पिल्ले को तलाश लिया और निकाल लाई. इसके बाद उसने अपने दूसरे पिल्ले को उस मृत पिल्ले के सामने दूध पिलाना प्रारम्भ किया जिसके पीछे उसका मंतव्य यह था कि दूध पीने वाले पिल्ले को देखकर मृत पड़ा पिल्ला भी शायद दूध पीने को उद्यत हो उठे. लेकिन ऐसा न होना था न हुआ, बाद में शाम तक उस पिल्ले को हटाकर दूर दफन किया गया. एक जानवर इतना सम्वेदनशील हो सकता है और हम इन्सान कहलाने का दम भरने वाले किस तक इन्सान हैं, सोचता हूं तो कांप जाता हूं.

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