क्या करेंगे हेडली को भारत लाकर?

अभी अभी जी के पिल्लई साहब का बयान पढ़ रहा था हेडली के बारे में. और इसके सम्बन्ध में छपी खबर भी कि अमेरिका हेडली का प्रत्यर्पण करना नहीं चाहता. कान पक चुके हैं और आंखे थक गई हैं हेडली के बारे में सुनते और देखते. पता नहीं अखबार वालों की कलम क्यों रुक जाती है और टीवी पर चिल्ला चिल्लाकर अपनी आवाज को बुलन्द करने वाले धर्मनिरपेक्ष स्वनामधन्य निर्भीक पत्रकारों की जुबान पर अंगारे क्यों आ जाते हैं दाऊद गिलानी (जोकि हेडली का सही नाम है) का नाम लेते हुए. खैर, भारत लाकर क्या करेंगे हेडली का? मुझे तो एक ही बात समझ में आती है कि शायद ये लोग उसे बाइज्जत बरी कराना चाहते होंगे. या फिर ये बयान दिलाना चाहते होंगे कि हेडली के विरुद्ध भगवा आतंकवादियों ने साजिश कर उसे फंसाया है. या फिर ये कि वो तो समाजसेवा के लिये भारत आया था और भारत में विभिन्न जगहों पर समाजसेवा के थोक आउटलेट खोलना चाहता था. अमेरिका में ट्रायल होगा तो साल-डेढ़ साल के अन्दर उसे सजा हो जायेगी और इतनी कि वह मरने के बाद ही जेल से बाहर निकल सकेगा. और भारत में? कितने समर्थ लोगों को सजा हुई है आजतक. और फिर कितनी बेशर्मी से बयानबाजी करते घूमते हैं राजनीतिबाज और सामंत (अफसर). वे सामंत जिन्हें न्याय का कत्ल करने में महारत हासिल है जो रुचिका जैसी नाबालिग बच्ची के यौन शोषण के तलबगार और उसकी मौत के जिम्मेदार अधिकारी को बेशर्मी से बचाते रहते हैं. वे जो हेडली के वीजा संबंधी और करकरे की जैकेट तथा इन जैकेटों की खरीद से जुडी फाइलें ही गायब करा देते हैं. वे जो यह जानते हैं कि पुलिस वालों को बिना हजार रुपये घूस दिये किसी बेदाग व्यक्ति की भी पासपोर्ट की फाइल आगे नहीं बढ़ती और पन्द्रह-बीस हजार देने पर पन्द्रह-बीस दिन में पासपोर्ट हाथ में आ जाता है. वे अफसर जिनकी नजरों पर कैसा चश्मा चढ़ा होता है जिसके द्वारा पासपोर्ट कार्यालय, आरटीओ आफिस और रजिस्ट्री दफ्तर के बाहर बैठे दलाल दिखाई नहीं देते. वे ओहदेदार जिन्हें हर चौराहे पर होती वसूली दिखाई नहीं देती. जिनको यह नहीं पता कि इस देश में नियम पर चलने वाले की ऐसी तैसी हो जाती है और मुठ्ठी गर्म करने वाले की बल्ले-बल्ले. कभी कभी तो ये भी लगता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि गिलानी को भारत बुलाकर चुनाव लड़वाना हो इसलिये प्रत्यर्पण की बात सोची जा रही हो.

थरूर वीजा नियमों को कड़ा करने के विरुद्ध हैं. होना भी चाहिये. आखिर जब हम पाकिस्तानियों को गुम होने का पूरा मौका देते हैं और बांग्लादेशी घुसपैठियों को कानून बनाकर देश में कब्जा करने की पूरी मोहलत देते हैं और अपने यहां ही घोर साम्प्रदायिक नीतियों को बढ़ावा देते हैं तो वीजा नियमों को ही कड़ा कर कौन सा तीर मार लेंगे.

Comments

Popular posts from this blog

एक सलाह मजबूरी पर...

कुछ पुरानी यादें