कसाब को छोड़ दिया जाना ही उचित है.
कारण नम्बर एक - शुक्ला जी के नजरिये से भी एकदम उचित है, वही क्रिकेट वाले शुक्ला जी जिन्होंने कुछ दिन पहले ही कहा था कि कुछ करोड़ रुपये की घूसखोरी के आरोपों के चलते एक विदेशी मेहमान को कितनी दिक्कत उठानी पड़ी और इस छोटी सी हकीर रकम के आरोपों की जांच के लिये सैकड़ों करोड़ बर्बाद करना कहां तक ठीक है. इसलिये कसाब के ऊपर करोड़ों खर्चना कहां तक उचित है जबकि एक गोली की कीमत मात्र चालीस या पचास रुपये, राइफल की कीमत साठ-सत्तर हजार रुपये और ग्रेनेड की कीमत दो-चार हजार रुपये, कुल मिलाकर आठ-दस लाख रुपये के खर्च के ऊपर इकतीस करोड़ रुपये का व्यय कहां तक उचित है?
कारण नम्बर दो - कैसे पता चलता कि हम लोग इतने बहादुर हैं कि बम-धमाकों के बाद भी देश चलता रहता है, ये कायरतापूर्ण घटनायें हमें रोक नहीं पातीं हमारी एकता और अखण्डता में रत्ती भर कमी नहीं आती है चाहे लाखों लोग ही अभी तक क्यों न मारे जा चुके हों. कैसे पता चलता कि हम लोग धर्मनिरपेक्ष हैं, कैसे पता चलता कि हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति की जड़ें मुम्बई से घुसकर दिल्ली में यमुना तक फैली हुई हैं. कैसे पता चलता कि इन छोटे-मोटे काण्डों से मुम्बई रुकती नहीं, चलती रहती है.
कारण नम्बर तीन - अगर यह सब न हुआ होता तो हम लोग कहां स्यापा मनाते? कैसे इतने लोगों को शहीद होने का दर्जा मिलता? कैसे पता चलता कि अफसर इतने दूरदर्शी हैं कि उन्हें बैठे-बैठे ही पता चल जाता है कि दो गुटों में फायरिंग हो रही है. आखिर यह भी तो बड़ी बात है कि चार्जशीट होने से बचा अधिकारी इस घटना के कारण ही शहीद का दर्जा पा गया. कैसे पता चलता कि एक नेता तो इतना बहादुर है कि गोलियों के बीच ताज में जाकर कुछ लोगों को बचा निकालने का माद्दा रखता है.
कारण नम्बर चार - आखिर इस सब का ही नतीजा है कि यह तो पता चल गया कि कुत्ते शहीदों के घर नहीं जाते. कुत्तों बुरा न मानो, अब आदमी होना गाली हो गया है. अगर आप किसी को गरियाना चाहो तो कहना कि अबे आदमी है क्या, आदमी समझ रखा है क्या, आदमी के बच्चे, वगैरा, वगैरा.
कारण नम्बर पांच - इस सब से सुरक्षा एजेंसियों तथा गृह मन्त्रालय की मुस्तैदी भी पता चल गयी. खुफिया वालों ने गृह मन्त्रालय को सूचित कर दिया था कि हमले की आशंका है, गृह मन्त्रालय ने राज्य सरकार को और राज्य सरकार ने सुरक्षा एजेन्सियों को. सुरक्षा एजेन्सियों ने भी सुरक्षा चाक-चौबन्द कर दी, लेकिन इस का क्या किया जाये कि जहां की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की वहां इन्होंने एक भी गोली नहीं चलाई, एक भी ग्रेनेड नहीं फोड़ा.
कारण नम्बर छ: - इस सब की न्यायिक जांच नहीं की गई, एक भी कमीशन नहीं बैठाया गया. अब पता नहीं कि अजमल कसाब है या अश्वमल कच्छप. यह भी हो सकता है कि यह अश्वमल कच्छप हो जैसे कि कुछ धर्मनिरपेक्ष लोगों और उर्दू के अखबारों तथा मौलवियों ने भी इंगित किया कि उसके हाथ पर लाल धागा था. उसके दाढ़ी भी नहीं थी तथा वह टोपी भी नहीं पहने था. इसलिये पहले तो इसकी ओरिजिनल आइडेन्टिटी की जांच होनी चाहिये, इसके लिये एक कमीशन बैठाया जाये.
कारण नम्बर सात - यह भी हो सकता है कि यह भगवा आतंकियों की चाल हो. अन्यथा क्या कारण है कि एक भगवा आतंकी को गिरफ्तार करने वाला ही निशाने पर आया. और यह भी हो सकता है कि किसी पुलिस वाले ने ही पुलिस वालों को मार दिया हो और नाम लगा दिया बेचारे कसाब या कच्छप जो कोई भी है, उसका. यह भी हो सकता है कि किसी जज्बात के चलते शहीद बनने और शहादत पाने का जज्बा जोर मार गया हो और यह लोग खुद ही शहादत पा गये हों. कभी सरकारें शहादत दिलवा देती हैं तो खुद शहादत क्यों नहीं पा जा सकती यह खयाल आ गया हो.
कारण नम्बर आठ - अजमल कसाब को छोड़ने से साम्प्रदायिक सद्भाव में वृद्धि होगी. जो चला गया सो चला गया अब इसे सूली चढा़ने से उनके प्राण तो वापस नहीं आ जायेंगे. क्षमा बडेन को चाहिये का सिद्धान्त हम लोग भूलते जा रहे हैं. आखिर यह सब न होता तो कैसे हम चिल्लाते कि अंकल देखो पड़ोसी का बच्चा हमें मार रहा है. अंकल आप पड़ोसी को टाइट करो. कैसे दुनिया को पता चलता कि पड़ोसी का बच्चा हमें परेशान कर रहा है. कैसे हमारी सहनशीलता का पता दुनिया को चलता. कैसे हम इतनी सिम्पैथी का स्टाक कर पाते और कैसे हमारी सहनशीलता की परीक्षा हो पाती.
कारण नम्बर नौ - यह व्यक्ति मन्त्री बनने के काबिल है. युवा है, धर्मनिरपेक्ष है, जुनूनी है. यदि वास्तव में उसने ही गोली चलाईं तो यह पूछकर नहीं चलाई कि भई बता तू हिन्दू है, नहीं पूछा न. ग्रेनेड फेंका तो क्या जाति पूछकर फेंका. इसके अन्दर एक लायक नेता होने के सारे गुण मौजूद हैं, यह सब सुनता-जानता है लेकिन एक चतुर नेता की तरह चुपचाप रहता है और एक चतुर नेता की तरह ही अपने रिकार्डेड बयान से पल्टी मार जाता है.
कारण और भी हो सकते हैं लेकिन जब चोर-डकैत, गुंडे-मवाली माननीय बन सकते हैं तो एक आतंकवादी क्यों नहीं. गुरूजी, चेलाजी, झमेला जी जब सब पद पा सकते हैं तो कसाब क्यों नहीं. कसाब को तुरन्त ही रिहा कर राज्यसभा में भेजा जाना चाहिये जहां वह अल्पसंख्यकों के ऊपर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठा सके. यदि ऐसा न किया जाये तो फिर मेरी अपील है बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों से कि वह तुरन्त भूख-हड़ताल और आमरण अनशन पर बैठ जायें. आजकल इसका फैशन भी है.
कारण नम्बर दो - कैसे पता चलता कि हम लोग इतने बहादुर हैं कि बम-धमाकों के बाद भी देश चलता रहता है, ये कायरतापूर्ण घटनायें हमें रोक नहीं पातीं हमारी एकता और अखण्डता में रत्ती भर कमी नहीं आती है चाहे लाखों लोग ही अभी तक क्यों न मारे जा चुके हों. कैसे पता चलता कि हम लोग धर्मनिरपेक्ष हैं, कैसे पता चलता कि हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति की जड़ें मुम्बई से घुसकर दिल्ली में यमुना तक फैली हुई हैं. कैसे पता चलता कि इन छोटे-मोटे काण्डों से मुम्बई रुकती नहीं, चलती रहती है.
कारण नम्बर तीन - अगर यह सब न हुआ होता तो हम लोग कहां स्यापा मनाते? कैसे इतने लोगों को शहीद होने का दर्जा मिलता? कैसे पता चलता कि अफसर इतने दूरदर्शी हैं कि उन्हें बैठे-बैठे ही पता चल जाता है कि दो गुटों में फायरिंग हो रही है. आखिर यह भी तो बड़ी बात है कि चार्जशीट होने से बचा अधिकारी इस घटना के कारण ही शहीद का दर्जा पा गया. कैसे पता चलता कि एक नेता तो इतना बहादुर है कि गोलियों के बीच ताज में जाकर कुछ लोगों को बचा निकालने का माद्दा रखता है.
कारण नम्बर चार - आखिर इस सब का ही नतीजा है कि यह तो पता चल गया कि कुत्ते शहीदों के घर नहीं जाते. कुत्तों बुरा न मानो, अब आदमी होना गाली हो गया है. अगर आप किसी को गरियाना चाहो तो कहना कि अबे आदमी है क्या, आदमी समझ रखा है क्या, आदमी के बच्चे, वगैरा, वगैरा.
कारण नम्बर पांच - इस सब से सुरक्षा एजेंसियों तथा गृह मन्त्रालय की मुस्तैदी भी पता चल गयी. खुफिया वालों ने गृह मन्त्रालय को सूचित कर दिया था कि हमले की आशंका है, गृह मन्त्रालय ने राज्य सरकार को और राज्य सरकार ने सुरक्षा एजेन्सियों को. सुरक्षा एजेन्सियों ने भी सुरक्षा चाक-चौबन्द कर दी, लेकिन इस का क्या किया जाये कि जहां की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की वहां इन्होंने एक भी गोली नहीं चलाई, एक भी ग्रेनेड नहीं फोड़ा.
कारण नम्बर छ: - इस सब की न्यायिक जांच नहीं की गई, एक भी कमीशन नहीं बैठाया गया. अब पता नहीं कि अजमल कसाब है या अश्वमल कच्छप. यह भी हो सकता है कि यह अश्वमल कच्छप हो जैसे कि कुछ धर्मनिरपेक्ष लोगों और उर्दू के अखबारों तथा मौलवियों ने भी इंगित किया कि उसके हाथ पर लाल धागा था. उसके दाढ़ी भी नहीं थी तथा वह टोपी भी नहीं पहने था. इसलिये पहले तो इसकी ओरिजिनल आइडेन्टिटी की जांच होनी चाहिये, इसके लिये एक कमीशन बैठाया जाये.
कारण नम्बर सात - यह भी हो सकता है कि यह भगवा आतंकियों की चाल हो. अन्यथा क्या कारण है कि एक भगवा आतंकी को गिरफ्तार करने वाला ही निशाने पर आया. और यह भी हो सकता है कि किसी पुलिस वाले ने ही पुलिस वालों को मार दिया हो और नाम लगा दिया बेचारे कसाब या कच्छप जो कोई भी है, उसका. यह भी हो सकता है कि किसी जज्बात के चलते शहीद बनने और शहादत पाने का जज्बा जोर मार गया हो और यह लोग खुद ही शहादत पा गये हों. कभी सरकारें शहादत दिलवा देती हैं तो खुद शहादत क्यों नहीं पा जा सकती यह खयाल आ गया हो.
कारण नम्बर आठ - अजमल कसाब को छोड़ने से साम्प्रदायिक सद्भाव में वृद्धि होगी. जो चला गया सो चला गया अब इसे सूली चढा़ने से उनके प्राण तो वापस नहीं आ जायेंगे. क्षमा बडेन को चाहिये का सिद्धान्त हम लोग भूलते जा रहे हैं. आखिर यह सब न होता तो कैसे हम चिल्लाते कि अंकल देखो पड़ोसी का बच्चा हमें मार रहा है. अंकल आप पड़ोसी को टाइट करो. कैसे दुनिया को पता चलता कि पड़ोसी का बच्चा हमें परेशान कर रहा है. कैसे हमारी सहनशीलता का पता दुनिया को चलता. कैसे हम इतनी सिम्पैथी का स्टाक कर पाते और कैसे हमारी सहनशीलता की परीक्षा हो पाती.
कारण नम्बर नौ - यह व्यक्ति मन्त्री बनने के काबिल है. युवा है, धर्मनिरपेक्ष है, जुनूनी है. यदि वास्तव में उसने ही गोली चलाईं तो यह पूछकर नहीं चलाई कि भई बता तू हिन्दू है, नहीं पूछा न. ग्रेनेड फेंका तो क्या जाति पूछकर फेंका. इसके अन्दर एक लायक नेता होने के सारे गुण मौजूद हैं, यह सब सुनता-जानता है लेकिन एक चतुर नेता की तरह चुपचाप रहता है और एक चतुर नेता की तरह ही अपने रिकार्डेड बयान से पल्टी मार जाता है.
कारण और भी हो सकते हैं लेकिन जब चोर-डकैत, गुंडे-मवाली माननीय बन सकते हैं तो एक आतंकवादी क्यों नहीं. गुरूजी, चेलाजी, झमेला जी जब सब पद पा सकते हैं तो कसाब क्यों नहीं. कसाब को तुरन्त ही रिहा कर राज्यसभा में भेजा जाना चाहिये जहां वह अल्पसंख्यकों के ऊपर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठा सके. यदि ऐसा न किया जाये तो फिर मेरी अपील है बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों से कि वह तुरन्त भूख-हड़ताल और आमरण अनशन पर बैठ जायें. आजकल इसका फैशन भी है.
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