पांचवां पास, आठवीं फेल, हिस्ट्रीशीटर एम एल सी चुनाव में राष्ट्रीय पार्टियों से उतरे.

उत्तर प्रदेश में एम०एल०सी० अर्थात विधान परिषद सदस्यों के चुनाव हेतु नामांकन प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी है. कुछ सदस्यों के बारे में समाचार पत्रों से पता चला. कांग्रेसी प्रत्याशी आठवां पास है तो सपा का पांचवां. बसपा का इन्टर पास, भाजपा प्रत्याशी के बारे में मुझे पता नहीं है, लेकिन उसकी स्थिति भी कुछ भिन्न होगी इसकी संभावना कम है. कुछ निर्दलीय प्रत्याशी स्नातक भी हैं. मजे की बात देखिये कि स्नातक, परास्नातक, एम०फिल०, डी०लिट० और डाक्टरेट किये हुये लोग इन जाहिलों को चुनकर विधान परिषद में भेजेंगे. इस तरह के लोगों में कुछ गुण्डे-बदमाश-डकैत-हत्यारे भी हैं जिन्हें मीडिया दबंग का नाम देता है. अपने नाम पर इन लोगों के पास लिखा-पढ़त में कुछ नहीं है लेकिन एक भी आदमी करोड़पति से कम नहीं है. जमीनों पर कब्जे करना इन लोगों का प्रिय शगल है. जितनी एजेन्सियां विकास के लिये बनाई गयी हैं, जितने क्रियाकर्म साँरी कार्यक्रम चलाये गये हैं और जितना अधिक विकेन्द्रीयकरण किया गया है भ्रष्टाचार उतना ही अधिक बढा़ है. निचले सिरों पर जिन्हें अभी तक इस दरिया में डुबकी लगाने का मौका नहीं मिला था इस विकेन्द्रीयकरण के बाद मिल गया है. लोग एक तर्क बल्कि सही अर्थों में कुतर्क देते हैं कि विकास होता है तो भ्रष्टाचार होता ही है. शायद यही सोच सबसे घातक चीज थी जो अपने पाप छिपाने को नेताओं ने आम जन के दिमाग में भर दी. जनता यह सोच ही नहीं पाई कि भ्रष्टाचार का सबसे घातक असर सबसे नीचे तबके पर ही पड़ेगा और वही हुआ भी. इससे बड़ा घोटाला क्या होगा कि सरकार द्वारा प्रायोजित भ्रष्टाचार के चलते मंहगाई इस हद तक पहुंच गई कि गरीब के मुंह में निवाला तक पहुंचना दूभर हो गया और किसान-मजदूर जिसके हितों के लिये बड़े बड़े दावे किये गये थे वह और रसातल में पहुंच गया. छोटा और सीमान्त किसान जो अपनी जोत से जैसे तैसे गुजारा कर लेता था उसके लिये अब वह भी मुश्किल हो गया है और उसके पास नरेगा को सफल बनाने के अलावा और विकल्प नहीं बचा।
किसानी की ओट में निर्बाध रूप से कालाधन छुपाने के लिये नेताओं और अफसरों ने लगातार प्रयास किया है जिसमें वह सफल भी रहे हैं. पहले उद्योगपति नेता बनने की सोचते थे और अब नेता पद पाते ही उद्योगपति बन जाता है. और वही आठवां पास जो शायद कहीं मजदूरी कर रहा होता, अफसरों पर हुक्म चलाने लगता है. अफसर अपनी अच्छी पोस्टिंग मतलब अधिक रिश्वत पाने के लिये सही जगह पाना चाहते हैं और यहीं से नेता-अफसर गठजोड़ प्रारम्भ हो जाता है, बाकी नेता उद्योगपति तो अपने आप बन ही जाता है. फिर वही प्रक्रिया प्रारम्भ शोषण की. देश के साथ बलात्कार की. फिर वही स्यापा. फिर वही नौटंकी. हर हाथ को काम, बेरोजगारी, गरीबी का खात्मा. किसानों को खुशहाल जीवन की गारंटी।
ऐसी लोकतान्त्रिक अफीम पिला दी है समझौतावाद की, तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की, समाजवाद की और पता नहीं किस-किस वाद की कि गरीब बेचारा और गरीब हुआ चला जा रहा है और जिसने राजनीति के दरिया में गहरी डुबकी लगा ली वह धन्नाशाह बन गया. फिर उसकी तरफ आय-ऊय और हेरा-फेरा की निगाह नहीं जाती सब अपनी निगाहें फेर लेते हैं. शायद इसीलिये रहीम दास जी ने कहा था "जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूड़न डरा रहा किनारे बैठ". गलती किसकी, नेता और समाजसेवी, बुद्धि बेचकर जीने वाले बड़ी खूबसूरती से इसका दोष थोप देते हैं जनता पर. लेकिन यह नहीं बताते कि इसके अतिरिक्त जनता के पास क्या रास्ता है. जिसे टिकट दिया जायेगा उन्हीं में से तो किसी को चुना जायेगा और ऐसी व्यवस्था जिसमें मतदान अनिवार्य हो, पूरे मतों का इक्यावन प्रतिशत (दूसरी और तीसरी वरीयता के मत गिनकर) पाने वाले को विजयी माना जाए, किसी को वोट नहीं और वापस बुलाने का अधिकार जैसी चीजें ये कुटिल राजनीति के धन्धेबाज होने नहीं देंगे. पुराने धन्धेबाज बड़े चालाक थे, वे ये जानते थे कि जनता पढ़ जायेगी तो उनकी चालाकी ताड़ जायेगी, इसलिये निरक्षर ही रहने दिया, जो पढ़ सके वे अपने सतत प्रयासों और दृढ़ निश्चय के चलते ही पढ़ सके. जनसंख्या को इसीलिये काबू करने की कोई कोशिश नहीं की कि बढ़ी हुई जनसंख्या के लिये संसाधन हो ही नहीं पायेंगे और फिर यह भी एक खूबसूरत और बढिया बहाना रेडीमेड मिलता रहेगा. धन्य प्रजातन्त्र.

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