समझ में नहीं आ रहा कि मैं नये साल की खुशी में झूमूं या फिर जाने वाले साल का अफसोस करूं
नया साल आने वाला है. अभी ग्यारह बजे मैं यह लिख रहा हूं, मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मैं नये साल की खुशी में झूमूं या फिर जाने वाले साल का अफसोस करूं. हम में से अधिकांश व्यक्ति क्या समय का वास्तव में सदुपयोग करते है? और जब मैं स्वयं अपने पिछले एक वर्ष का लेखा-जोखा करने बैठता हूं तो पाता हूं कि मेरे जीवन का साल बेकार गया. कारण स्पष्ट है. जितना कुछ समाज ने मुझे दिया मैंने उसका हजारवां हिस्सा भी वापस नहीं किया. वह हर चीज जो प्रकृति ने मुझे बख्शी है, उसका मैं शुक्रगुजार हूं, लेकिन यहां पर भी मैंने प्रकृति का कर्ज उतारने के लिये कुछ नहीं किया. शायद यही ढर्रा चलता रहता है, हम लोग अपने में मशगूल रहते हैं.कर्ज लेते रहते हैं लेकिन उतारने के लिये कुछ नहीं करते. समाज और प्रकृति के प्रति जो हमारी जिम्मेदारी है, उसे हम नहीं निभा पाते. अधिकारों के लिये सजग रहते हैं लेकिन कर्तव्यों के नाम पर उदासीन हो जाते हैं. यहां पर भी वही चीज सामने आती है कि जब नियम-कानून का मखौल उड़ाने वाले मौज में रहते हैं और उन्हें इसकी सजा न मिलकर मजा मिलता है तो कानून का पालन करने वाले हताश हो जाते हैं. दोनों तरह के ही लोग हमारे ही समाज से आये हैं. नजरिया संकुचित होने के कारण मनुष्य मैं तक सिमटता जा रहा है. निजाम हम से ही बना है. हमारे अन्दर बदलाव आते ही निजाम बदल जायेगा. आवश्यकता कड़ी से कड़ी जोड़ने की है, आशाओं के दीप जलाने की है. इस वर्ष कोशिश करूंगा कि कुछ बच्चों को शिक्षित कर सकूं और पर्यावरण के हित के लिये कुछ कर सकू. आशा करना अच्छी बात है, लेकिन इसे भी याद रखने की कोशिश करूंगा कि जीवन का फुलस्टाप बताकर नहीं आता, लिहाजा जो भी समय (अमूल्य समय) मुझे मिल रहा है, उसके हर एक क्षण का सदुपयोग कर सकूं. नये वर्ष की शुभकामनायें.
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