आम आदमी के मुहं पर पड़ा थप्पड़

इस पोस्ट को लिखने से मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं. अभी अभी एक खबर देखी कि लखनऊ के डीएम अमित घोष ने हड़ताल पर बैठे कर्मचारी को थप्पड़ मारा. आखिर किस तरह के समाज में जी रहे हैं हम. क्या आईएए़स और आईपीएस बनने से कोई किसी को भी पीटने का हकदार हो जाता है? हो सकता है कि वह हड़ताली कर्मचारी बिल्कुल निकम्मा और कामचोर हो तथा सरकारी काम में बाधा डाल रहा हो तो ऐसे कर्मचारी को नौकरी से निकालने के लिये व्यवस्था मौजूद है. मैं किसी निकम्मे कर्मचारी का बचाव भी नहीं कर रहा, लेकिन यह कहां लिखा है कि डीएम कर्मचारी को पीट सकता है. कहां चला गया संविधान और कहां चली गयी उसमें दी हर व्यक्ति की गरिमा की रक्षा की गारंटी. ऐसा ही नजारा आप को हर रोज हर शहर में मिल सकता है, कहीं कोई डीएम के रूप में, तो कहीं कोई पुलिस की वर्दी पहने या फिर कहीं कोई दबंग अपने बल का प्रयोग करता दिखाई देता है. यदि कोई कर्मचारी यदि किसी अधिकारी के साथ यह सुलूक करे तो उसका हश्र क्या होगा. यह कानून की किस किताब में लिखा है कि हड़ताल तुड़वाने के लिये मारपीट करो. अन्तर दोनों के बीच में इतना है कि मार खाने वाला आईएए़स नहीं बन पाया और मारने वाला बन गया. मैं नक्सलियों की शान में कसीदे नहीं काढ़ना चाहता और न ही उनके कुकृत्यों के पक्ष में हूं लेकिन यही लोग जब नक्सलियों के इलाके में पोस्ट हो जाते हैं तो इनकी बहादुरी हवा हो जाती है. क्या एक बड़ा ओहदा पाने से असमर्थों को पीटने का हक मिल जाता है. हमारे यहां का दुर्भाग्य यह है कि अच्छी पोस्टिंग पाने के लिये कुछ अधिकारी कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं और अच्छी पोस्टिंग से क्या तात्पर्य होता है सभी जानते हैं. और इसी कारण यह अफसर सरकार के बल्कि सरकार बनाने वाले दल के एजेन्ट के रूप में कार्य करने लगते हैं. कानून का यह मखौल देश के लिये घातक है. यदि ऊपर वाले लोग ही कानून हाथ में लेकर उसका तमाशा बनायेंगे तो किस मुंह से बाकियों से उसके सम्मान की आशा करेंगे. इस तरह की अफसरशाही देश का दुर्भाग्य है.

Comments

Popular posts from this blog

एक सलाह मजबूरी पर...

कुछ पुरानी यादें