यूं ही होते रहेंगे रेल हादसे.

पिछली रेल दुर्घटनाओं को अभी भुला भी नहीं पाये थे कि आज एक और हादसा हो गया. हर बार हादसे के बाद एक कमेटी बनाई जाती है और उसके बाद फिर क्या होता है, कुछ पता नहीं चल पाता. एक बार फिर वही मृतकों और घायलों को मुआवजे का ऐलान, दोषियों को सजा का. होता क्या है, जांच कमेटी की रिपोर्ट आती है, लीपा-पोती हो जाती है और लोग फिर तैयार होने लगते हैं दुर्घटनाओं में मरने के लिये. कर्मचारी भी दोषी हैं और सरकारें भी. जड़ कोई काटना नहीं चाहता सिर्फ पत्तियों को नोचने का दिखावा करते रहते हैं सब. जब कर्मचारी कम हैं तो बढाये क्यों नहीं जाते. जो नाकाबिल हैं उन्हें नौकरी से निकाला क्यों नहीं जाता. जो जितना बड़ा उसकी तनख्वाह उतनी ही ज्यादा, काम उतना ही कम. मैंने न जाने कितने अफसरों कर्मचारियों को देखा है जो काम नहीं करते और उनपर कोई कार्रवाई नहीं होती जिसका खामियाजा काम करने वालों को इन निकम्मों का भी काम करके भुगतना पड़ता है. बात हो रही थी इस दुर्घटना की. इस देश में नियम कानून से कौन काम करना चाहता है और करे भी क्यों. लखनऊ-दिल्ली के मध्य रेलवे क्रासिंग का नजारा देख लीजिये, पढ़े लिखे लोग लाइन से गाड़ी खड़ा करना पसन्द नहीं करते और क्रासिंग के एक ओर एक तरफ से आने वाली गाडियां खड़ी हो जाती हैं और दूसरी ओर दूसरी तरफ से आने वाली, लिहाजा जाम पक्का. यह तो काबिलियत हुई लोगों की. अब पुलिस की क्या जिम्मेदारी है? जिस चौकी में क्रासिंग पड़ती है यदि उसका इन्चार्ज क्रासिंग पर गाहे-बगाहे ऐसे वाहनों का चालान करने लगे तो थोड़े ही दिनों में लोगों को यह अच्छी तरह से याद हो जायेगा कि फला क्रासिंग पर बेतरतीब वाहन खड़ा करने पर चालान हो जाता है. लेकिन जब लाइन में खड़ा व्यक्ति यह देखता है कि पीछे से आने वाला वाहन लाइन में न खड़ा होकर आगे चला गया और पहले निकल गया तो वह अगली बार लाइन में खड़ा नहीं होता. रामपुर के पास कई बार यह देखा है कि लोगों द्वारा क्रासिंग पर गाड़ियां लगा देने के कारण ट्रेन को आधा-आधा घण्टा खड़ा रहना पड़ गया. यह भी सत्य है कि कई स्टेशन मास्टरों को बारह-बारह घण्टे से भी अधिक ड्यूटी करना पड़ती है. गार्ड तथा ट्रेन ड्राईवरों के बारे में भी यही आलम है. वे बेचारे कहें भी तो किससे. ऊपर कोई "न" भी नहीं सुनना चाहता और अपने हुक्म की उदूली भी नहीं बर्दाश्त नहीं कर सकता. हर विभाग अपने खर्चे कम करने के लिये नीचे के कर्मचारियों की कटौती में लगा हुआ है जिसका असर सेवाओं के कुप्रबन्धन के रूप में मिल रहा है. एक विभाग की बैलेन्स शीट देख रहा था जिसमें वेतन के पांचवे हिस्से के बराबर की राशि यात्रा और स्थानान्तरण भत्ते में खर्च हुई थी. तत्पश्चात मैंने और अध्य्यन किया तो यह पाया कि इसमें से भी सत्तर प्रतिशत राशि ग्रुप ए अधिकारियों पर व्यय हुई थी जिनका प्रतिशत पांच था. अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि मुर्दे को हल्का करने के लिये बाल काटने का उपक्रम किया जा रहा है. परिणामत: जो वर्किंग हैण्ड हैं उनकी संख्या कम हो रही है और बचे हुए लोगों पर बोझ बढ़ रहा है. नाकारा और निकम्मों को भी ढोया जा रहा है. कानून का खौफ किसी को है नहीं. एंटी कोलिजन डिवाइस आज तक लग नहीं पाई. वजह सरकार को ही पता होगी. अफसरों और सांसदों विधायकों की सुविधाओं के लिये अकूत धन है लेकिन नागरिकों की सुरक्षा के लिये एंटी कोलिजन डिवाइस लगाने के लिये पैसा नहीं है. कुछ देर पहले ही दिग्विजय सिंह जी को यह कहते हुये सुना था कि यदि लोग मंहगाई इत्यादि से नाराज ही होते तो दोबारा यूपीए को क्यों चुनते. उनके इस कथन में ही पूरा सार छुपा है. इसलिये जब तक जिन्दा रहें हर दिन को बोनस मानते रहें.

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