जम्बू द्वीप के अखंड देश के प्रखंड में विकराली दल का राज्य, चीतों का आक्रमण तथा अमात्य पर कार्रवाई के आदेश
एक समय की बात है जम्बू द्वीप में अखंड नामक देश में एक महामंदिर नाम के शासक का राज्य था. उस अखंड नामक देश में प्रखंड व्यवस्था के अन्तर्गत कई प्रखंड हुआ करते थे. ऐसे ही एक प्रखंड में विकराली दल नामक एक दल का राज था. वह विकराली दल कई वर्ष से राज्य करता चला आ रहा था. येन केन प्रकरेण उस दल को सत्ता से हटाना ही महामंदिर का उद्देश्य बन गया था. विकराली दल को चुनौती देने के लिये महामंदिर ने अपने युवराज को यह कार्य सौंपा. युवराज ने विकराली दल को हटाने के लिये एक असंतुष्ट युवा को खड़ा कर दिया. इस असंतुष्ट युवा ने चीता सेना बना ली. धीरे-धीरे चीतों ने पूरे प्रखंड को अपने हमलों से दहला दिया महामंदिर की इच्छा पूरी हो गई. प्रखंड में विकराली दल की सरकार को शासन-व्यवस्था में नाकाम पाकर अखंड देश महाराज्यीय शासन लागू कर दिया. लेकिन इधर चीता सेना के हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. चीता सेना का संस्थापक वह असंतुष्ट युवा अब इस प्रखंड को चीतों के देश में बदलना चाहता था जिसके लिये अब वह महामंदिर और युवराज का भी हुक्म मानने को तैयार नहीं था. वह अब महामंदिर द्वारा दिये गये साधनों का प्रयोग महामंदिर के विरुद्ध ही करने लगा.
अखंड देश का एक मित्र देश भी था, उस मित्र देश ने महामंदिर को बताया कि चीता सेना के प्रमुख और लडाकों ने प्रखंड के एक धार्मिक स्थल में शरण ले ली है. इस गुप्त सूचना के आधार पर महामंदिर ने चीता सेना के ऊपर हमला किया और उन सबको मार गिराया. इस के बाद धीरे-धीरे हालात सामान्य होने लगे. कुछ वर्षों बाद महामंदिर के ऊपर प्रखंड देश के रहने वाले निवासी ने हमला किया और उन्हें मार दिया. इस हत्या के बाद महामंदिर के समर्थक उग्र हो गये. समर्थकों ने प्रखंड के रहने वाले लोगों के ऊपर हमले किये और रक्षक सेना खड़ी देखती रही. चूंकि हमला करने वाले समर्थक थे, कुछ राज्य के अमात्य भी थे, जो अपने राजधर्म का पालन कर रहे थे, लिहाजा उन्हें कौन रोक सकता था. जो नियम बनाता हो तो उसे तोड़ने से कैसे रोका जा सकता है. अमात्यों ने अपना काम किया, शासकीय रक्षकों ने अपना. मानवाधिकार वादियों ने अपना. प्रखंड के निवासियों ने अपना दुख-दर्द नये राष्ट्राध्यक्ष से बयान किया. नये राष्ट्राध्यक्ष ने तुरन्त कार्रवाई करते हुये एक समिति का गठन कर दिया. एक जांच समिति बना दी और रक्षकों के लिये तत्परता से कार्रवाई करने का हुक्म जारी कर दिया. जांच समिति ने आठ साल और सात महीने में अपना निष्कर्ष दिया कि दंगे तो वास्तव में हुये हैं, लोगों की जानें भी गई हैं और उनके मकान-दुकान भी जलाये गये हैं. लेकिन दंगाइयों की पहचान पूरी तरह से नहीं हो पाई है. इस पर एक कमीशन और बैठा दिया गया तथा जांच समिति की रिपोर्ट पर कार्रवाई करने के लिये निर्देश जारी कर दिये गये. जांच समिति में एक-दो सिरफिरे भी थे जिन्होंने यह देख लिया कि कुछ अमात्य भी दंगों में शामिल थे.
इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर अखंड राष्ट्र की ला एन्फोर्सिंग एजेंसी ने अमात्य के ऊपर कार्रवाई करने के लिये मंजूरी हेतु शासन को पत्र लिखा और दंगों के एक-चौथाई शतक के बाद अमात्य पर कार्रवाई करने हेतु ला एन्फोर्सिंग एजेंसी को मंजूरी दे दी गई.
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