पुणे में बम विस्फोट में दस की मौत-चलो फिर मोमबत्ती जलायें

पिछले एक लेख में मैंने लिखा था "रोज चेतावनी दी जा रही है देश की जनता को. सब अपना अपना कर्तव्य बखूबी निभा रहे हैं. मन्त्री अपना और प्रधानमन्त्री अपना. अफसर भी इसी दिशा में कदमताल मिलाकर वक्त के साथ चल रहे हैं. उनकी तरफ से भी चेतावनी जारी कर दी जाती है. रुटीन बन गया है चेतावनी जारी करना. बल्कि एक स्थाई चेतावनी जारी कर दी जाये कि " आतंकवादी कभी भी और कहीं भी बम फोड़ सकते हैं, कहीं भी गोलियां बरसा सकते हैं, अपनी जानमाल की रक्षा स्वयं करें." एक बयान भी अनडेटेड जारी कर दें कि प्रधानमन्त्री और गृहमन्त्री तथा यूपीए की अध्यक्ष ने हमलों की कड़ी निन्दा की है, दोषी बख्शे नहीं जायेंगे, तथा मरने वालों को पांच लाख और घायलों को पचास हजार. आतंकियों के मुस्लिम होने की बात होती है तो सिकुलर मीडिया और पार्टी तथा घोर कट्टरपंथी मुस्लिम नेता बयानबाजी करने लगते हैं कि इस्लाम में दहशतगर्दी की इजाजत नहीं है, जुल्म करना गुनाह है, वगैरा-वगैरा. और फिर यदि गलती से कभी दो-चार आतंकी मारे जाते हैं तो ये सभी लोग उस पर उंगली उठाने लगते हैं, ऊपर से रही बसी कसर नेता खुद पूरी कर देते हैं. जब आतंकी गिरफ्तार हो जाते हैं तो मुस्लिमों की ओर से आरोप लग जाता है कि बेकसूर पकड़े जा रहे हैं, नेता भी जाते हैं और कह आते हैं कि तीन महीने में पकड़े गये मासूम बाहर आ जायेंगे" और यह दुखद सूचना आज शाम को मिली कि पुणे में ओशो आश्रम के पास जर्मन बेकरी में बम विस्फोट में दस व्यक्ति मारे गये. वही बेशर्म प्रक्रिया फिर से दुहराई जाने लगी. क्या करेंगे हम बेशर्म नेता, निकम्मे अफसर और नाकारा नीतियों का? क्या यह बयान, प्रेस नोट, धर्म-निरपेक्षता के नाम पर आतंकियों का समर्थन करने वाले लोग एक भी मारे व्यक्ति को वापस ला सकते हैं? कल फिर निन्दा, प्रेस नोट, कड़ी सुरक्षा, सख्त कार्रवाई, साम्प्रदायिक सद्भाव बनाये रखने की अपील और आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता, पुणेवासी आतंक से जीत गये, जैसे जुमले सुनाई देने लगेंगे.

शाहरुख ने अमेरिका में थोड़ी पूछताछ होने से आहत होने पर "माई नेम इज खान" दी. क्या शाहरुख अब " माई नेम इस डिसीस्ड इन पुणे बम ब्लास्ट" बनायेंगे? शायद नहीं. शायद फिर दिग्विजय और रीता जोशी आजमगढ़ जाकर एक बार फिर "मासूमों" के जल्द बाहर आने का वायदा कर आयेंगे. अभी तक बम विस्फोटों और आतंकी कार्रवाईयों में मारे गये लोगों के घर कितनी बार यह नेता ढ़ाढ़स बंधाने गये हैं. शायद एक बार भी नहीं पहुंचे होंगे क्योंकि मारे गये लोगों के वोट सरकार बनाने में कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभाते और बाकी लोग यही सोच लेते हैं कि उनके यहां तो बम विस्फोट नहीं हो सकता, उनके ऊपर आतंकियों की गोली नहीं पहुंच सकती. लेकिन यही सत्य है कि आज जो विस्फोट पुणे में हुआ है, वही कल भारत के किसी भी शहर में हो सकता है, जिसके बारे में पहले ही सरकार चेतावनी जारी कर चुकी है. लेकिन हम कभी नहीं सुधरते. अपनी शुतुरमुर्गी सोच के चलते खतरा देखने कर उसका सामना करने की योजना बनाने की बजाये सिर रेत में छुपाना अधिक पसंद करते हैं. धिक्कार है हमारी सोच पर. शाहरुख के साथ जांच को लेकर न जाने कितने लेख छपे, अमेरिका द्वारा एशियाई और अरब मूल के मुस्लिमों को वीजा देने में अपनाई जा रही कड़ी प्रक्रिया पर कितनी उंगलियां उठाई गयीं. लेकिन 26/11 के बाद आज तक आतंकी अमेरिका में कोई हमला करने में कामयाब नहीं हो सके. दर-असल हमारे यहां लोग स्वयं ही सुरक्षा को लेकर चिन्त्तित नहीं हैं. जो चिन्तित हैं वे कुछ करना नहीं चाहते सिवाय चिन्ता जताने के. इसलिये फिर मोमबत्ती तैयार रखो, अब पुणे में जलाओ, और थोड़ी अधिक खरीद कर रखो, न जाने किस शहर में जलाना पड़ जाये.

और अंत में-सरकार को, सरकारी मशीनरी को सम्मानित करना चाहिये कि आखिर उन्होंने सही समय पर चेतावनी दे दी. अब जान नहीं बचा पाये तो इसमें किसी का क्या दोष.

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