क्या प्रभात शुंगलू जी ने मकबूल फिदा हुसैन द्वारा बनाये गये चित्र देखे भी हैं?

जी नहीं. उनके ब्लाग का एक लेख जो शब्दश: नीचे दिया जा रहा है, गौर फरमायें.प्रभात जी का मूल लेख इस साइट पर छपा है..

"हुसैन, तुम माफी मत मांगना

मकबूल फ़िदा हुसैन को कतर की नागरिकता दिये जाने पर एक बार फिर से उन्हें खोने का ऐहसास हो रहा। लेकिन राजनीति की बिसात पर हुसैन बस मोहरा बन कर रह जाते हैं। आज सेक्युलरिज़म की दुहाई देने वाले चुप हैं। ये वही लोग हैं जिन्होने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को सरकारी दस्तावेजों के विशाल डम्पिंग ग्राउंड में दफन कर दिया है। ये हिम्मत कौन दिखाएगा कि उस रिपोर्ट को बाहर निकाल कर, उसे झाड़ पोंछ कर उसपर सिरे से अमल किया जाए। हुसैन से अलग जस्टिस सच्चर ने जो देश की अक़लियत के विकास का एक्स-रे निकाला उसमें देश की सेक्युलर छवि तार-तार दिखी।

सेक्युलरवाद की दुहाई देने वाला ये समाज अक्सर कट्टरवादी हो-हल्ला करने वालों के सामने घुटने टेकता देखा गया। सरकारी तंत्र भी नपुंसक बन जाता है। यदि ऐसा न होता तो हुसैन को दुबई जाकर न बसना पड़ता। महाराष्ट्र के पंढरपुर की धरती पर वो दोबारा लौटते जहां उन्होंने जन्म लिया था। लेकिन महाराष्ट्र की धरती को तो मातोश्री विचारधारा वाले बिगड़ैल शिवसैनिक सींच रहे हैं। बाकी जगहों पर हुसैन के खिलाफ बजरंगियों ने मोर्चा खोला हुआ था। हम उन जैसे कुंठित विचारधारा के लोगों को भी सह रहे हैं। हमने उनके सामने भी घुटने टेके, हम तो उनसे भी डर गए जो ये बता रहे थे कि किताब धर्म और मज़हब का मज़ाक उड़ा रही। इसलिये हमने वो किताब बिना पढ़े ही बैन कर दी। फिर तस्लीमा नसरीन के वीज़ा की मियाद इसलिये नहीं बढ़ाई कि वो और ज्यादा रहीं तो एक वोट देने वाला एक तबका नाखुश हो जाएगा। पश्चिम बंगाल की सीपीएम सरकार ने तो उन्हें राज्य से ही तड़ीपार का हुक्म दे दिया। हमने प्रूव कर दिया कि हम पूरी तरह से सेक्युलर हैं - हुसैन को दुबई भेजकर, तस्लीमा को तड़ीपार कर और सलमान रुश्दी की किताब पर प्रतिबंध लगाकर। लेकिन यही हमारे सेक्युलरिज्म का दोमुंहापन है, यही हमारी तमाम सरकारों का दोमुंहापन है और यही दोमुंहापन हमारे समाज में भी व्याप्त है।

चीन में सरकारी आतताइयों के खिलाफ वहां का युवा वर्ग जब खड़ा हुआ तो तिआनन मेन चौराहे की तस्वीरों नें दुनिया को हौसला दिया कि आवाज़ दबाए नहीं दबाई जा सकती। लेकिन हमारी भारतीय परंपरा में न जाने कब ये वाइरस घर कर गया कि जो हो रहा उसे होने दो। बदलने की कोशिश मत करो। यही कारण था कि इमरजेंसी के दौरान कुछ आवाज़ें तो दबा दी गईं और कुछ खुद ही शांत पड़ गईं। जो शांत पड़ गये वो इंदिरा के उस रौद्र रूप के कायल हो गए और उनकी शान में कसीदे भी गढ़े। वो भी उसी तरह की एक्सट्रीम विचारधारा थी जो मकबूल फिदा हुसैन को वतन छोड़ने के लिये मजबूर कर देती है। हम अतिवाद को लेकर सहनशील होते जा रहे जबकि तरक्की की राह पर चलने से पहले अतिवाद का त्याग पहली शर्त होनी चाहिये थी।

जब 2004 में यूपीए गठबंधन बना तो इस गठबंधन में देश की तमाम छोटी बड़ी पार्टियां जुड़ीं। कश्मीर से चेन्नई तक। असम से आंध्र तक। तमाम पार्टियों ने मिलकर हुकूमत करने का प्लान बनाया। लेकिन जो गठबंधन सेक्युलरिज्म और विकास के मुद्दे पर सत्ता पर काबिज हुआ उसने भी हुसैन को भारत वापस लाने के लिए कुछ नहीं किया। बल्कि उसी के शासन काल में ही हुसैन को कट्टरपंथी हिंदू संगठनों की धमकियों के चलते हिंदुस्तान छोड़ना पड़ा। इन कट्टरपंथी संगठनों नें हुसैन पर हिंदु देवी-देवताओं की मर्यादा के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए देश भर की विभिन्न अदालतों में मुकद्दमे ठोंक दिये। लेकिन बात सिर्फ अदालत तक रुकती तब भी ठीक था। हुसैन को धमकियां मिलने लगीं और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। हुसैन को शायद सरकार का ये छद्म सेक्युलरवाद रास नहीं आया और इसलिये उन्हें वतन छोड़ने का कड़ा फैसला लेना पड़ा। सेक्युलरिज़्म के नाम पर सॉफ्ट हिंदुत्व का मुखौटा ओढ़ने का आरोप कांग्रेस पर हमेशा लगता आया है। ये एक ऐसा आरोप है जो कांग्रेस पार्टी ने सत कर लिया है। इसलिये इसको लेकर उसकी संवेदनशीलता सुन्न हो चुकी है।

आज जब कतर की राजशाही ने 95-वर्षीय हुसैन को कतर की नागरिकता बतौर तोहफा भेंट की है तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये। उन्होंने कतर की नागरिकता के लिये एप्लाई नहीं किया था। वैसे भी हुसैन पिछले चार साल से हिंदुस्तान के रेसीडेंट होते हुए भी नॉन-रेसीडेंट इंडियन की ज़िदगी बसर कर ही रहे थे। लक्ष्मी निवास मित्तल और लॉर्ड स्वराज पॉल की तरह अब वो किसी भी देश के नागरिक बनें हमें क्या। एक भारतीय अंग्रेज़ी दैनिक के संपादक को भेजे एक छोटे से संदेश में उन्होने अपने नाम के आगे \'द इंडियन ओरिजन पेंटर\' लिखा है और कहा है कि इस भेंट से उनका मान बढ़ा है। इन दिनों हुसैन भारतीय सभ्यता और अरब सभ्यता के थीम पर अपने दो अभिन्न प्रोजेक्ट में जुटे हैं। भारतीय सभ्यता पर नई पेंटिग्स का प्रोजेक्ट हुसैन को विदेशी धरती पर रहकर पूरा करना पड़ रहा सेक्युलरिज़म और सहिषुणता पर इससे बड़ा मज़ाक क्या होगा

चीन के ह्वेन त्सांग, मोरोक्को के इब्न बतूता और आज के उज़बेकिस्तान के अल-बरूनी से ही हमें भारतीय समाज और उस समय के इतिहास के सुनहरे पन्नों को पढ़ने का मौका मिला। इंडियन ओरिजन के कतरी नागरिकता वाले मकबूल फ़िदा हुसैन अब एक विदेशी कूचे से हिंदुस्तान और पंढरपुर का इतिहास रंगेंगे। उनके इस प्रोजेक्ट में मां सरस्वती पल-पल उनके साथ हो, मां दुर्गा उनके साहस में और इज़ाफा लाए और भगवान विठ्ठल पंढरपुर के पाट खोलकर खुद उनपर स्नेह बरसायें ये हर उस हिंदुस्तानी की कामना है जिसे जात-पात, प्रांतवाद और मज़हब के खांचे में रखकर उसे बांटने की चौतरफा साजिश रची जा रही है। लेकिन वो डटा हुआ है और घुटने नहीं टेकना चाहता। आज भी हुसैन के वापस लौटने की शर्त लगाई जा रही कि माफी मांग लें और वतन लौट आएं। हुसैन साहब, आप भले ही हिंदुस्तान न लौटें पर धर्म के इन ठेकेदारों से कतई माफी मत मांगिएगा। भारतीय सभ्यता की यही पहचान है।"

शुंगलू साहब दूसरों के बारे में लिख रहे हैं कि लोग बिना पढ़े ही किताबों पर प्रतिबन्ध लगाने की बात करते हैं, लेकिन मेरा यह दावा है कि शुंगलू साहब ने उनके प्रिय धर्मनिरपेक्ष कलाकार हुसैन साहब के बनाये हुये चित्र  देखे ही नहीं. यदि उन्होंने यह चित्र देखे होते तो शायद इस लेख को लिखते समय उनकी उंगलियां कांप उठतीं.  शुंगलू साहब इस ब्लाग पर जाकर हुसैन साहब द्वारा बनाये गये हिन्दू देवी-देवताओं और बाकी धर्मों के व्यक्तियों के चित्र  देखिये और फिर अपने लिखे हुये को पढ़कर देखियेगा. शायद नजर का धुंधलका साफ हो जाये.


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