आरजू

अब कोई तमन्ना नहीं बाकी, अब कोई आरजू नहीं बाकी।
उनके कूंचे से निकले जनाजा मेरा, है बाकी तो ये आरजू बाकी।
इश्क तो बाकी है अभी हममें, उनमें मगर वफा नहीं बाकी,
सोचता हूँ खल्बत में, वो किसको देंगे सजा,
यहाँ तो न दिल बाकी और न ही जाँ बाकी।
जाम पे जाम आज तू पिलाये जा, मस्त नजरों से अपनी तू छलकाए जा।
रिंद हूँ मैं न बहकेंगे मेरे कदम, आज मैं नहीं बाकी या मय नहीं बाकी।
अब कोई सहारा नहीं बाकी, अब कोई किनारा नही बाकी,
छोड़ कर भंवर में सभी चल दिए, तूफानों से खेलेगी जिंदगी बाकी।

यह श्री घनश्याम जी की रचना है.

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