जब भी मैं सड़क पर निकलता हूं..

ऐसे दृश्य देखने को मिल ही जाते हैं. हर चौकी, थाने, परिवहन वालों के साथ दस्तूरी निभती रहती है. बदस्तूर चलता रहता है ये सिलसिला. हुक्मरान आंखे फेर लेते हैं .आईएस, IPS बनने वाला बनने से पहले सब देखता है, बनने के बाद भूल जाता है. जब कभी दुर्घटना होती है तो रस्म अदायगी के बतौर चार-छ: का चालान और डी-एम, एस-एस-पी,आर-टी-ओ के कड़कते बयान छप जाते हैं. इति श्री हो जाती है. इन बेचारों की मजबूरी है दो रुपये बचाने के लिये जान जोखिम में डालना, लेकिन इसे रोकने वालों की तनख्वाह तो एक लाख रुपये महीने तक है, फिर भी ये मजबूर हैं. हाय-हाय ये मजबूरी. अब मजबूरी का नाम मत पूछना. फोटो पर नजर डालिये और देखिये इन मजबूरों को..

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