काला धुंआ और कल-कल बहती नहर........
सुबह का नजारा था. नहर में बहते पानी ने मन मोह लिया. वैसे भी मनुष्य एक सामाजिक "जीव" ही है. और जीव जन्तुओं का प्राकृतिक निवास तो जंगल ही है इसीलिये नदी, झरने, पहाड़, जंगल, पेड़-पौधों की ओर आदमी खुद ही आकर्षित हो जाता है. उसके अन्दर का "जीव" जग उठता है. शारदा नदी से निकली इस "माइनर" में शीतल पानी बह रहा था, जिसे देखकर खुद को रोक न सका. आगे बढा तो इस सुन्दरता के बीच काला धुंआ उगलती चिमनियां दिखाई दीं एक भट्टे की. देखिए कैसा काला धुंआ निकल रहा है इसकी चिमनियों से. लोगों ने नदियों के रुख बदल दिये, तालाब और कुंये पाट दिये. नदियों में सीवर और कारखानों की वेस्टेज डाल कर उन्हें प्रदूषित कर दिया बढ़ती जनसंख्य़ा और लोगों के लोभ ने हमारी सारी प्राकृतिक सम्पदा को खतरे में डाल दिया है. जनसंख्या को रोकना आज की सबसे बड़ी मांग है. राजनीति बाज तो ऐसा कभी चाहेंगे ही नहीं क्योंकि उनके लिये लोग इन्सान नहीं हैं बल्कि वोट हैं... चित्र आगे पीछे हो गये हैं. माफ कीजियेगा...
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