बिना पढ़े टिप्पणी दीजिये

पढ़कर टिप्पणी करना भी कोई बात है. बड़ा ही मामूली सा काम है. पढ़िये, समझिये और फिर जैसा लगे वैसी टिप्पणी जड़ दीजिये. लेकिन असली मजा तो तब है जब बिना पढ़े ही या फिर शीर्षक मात्र पढ़कर ही टिप्पणी दी जाये. खैर बातें तो होती ही रहेंगी, लेकिन प्रारम्भ कर दिया जाये कुछ टिप्पणियों से जो छोटी तो अवश्य हैं लेकिन हैं बड़े काम की. यहां पर कुछ रेडीमेड टिप्पणियां तैयार हैं. बस इन्हें अपने दिमाग में रखिये, शीर्षक देखिये और झट से एक टिपा दीजिये. कुछ एक शब्दीय या द्विशब्दीय टिप्पणियां पेश-ए-खिदमत हैं., मसलन "nice", "very good", "excellent","बढ़िया", "अच्छा लगा","विचारोत्तेजक", "चिन्तनीय़", "वन्दनीय़", "निन्दनीय","खेद है", "दुख हुआ".

इसके बाद नम्बर आता है एक लाइना टिप्पणियों का. इनमें प्रमुख हैं, "अति उत्तम अभिव्यक्ति", "अभूतपूर्व विचार हैं ", "बहुत गहराई युक्त लेख", "सार्थक और प्रभावशाली अभिव्यक्ति", "चिंतनीय विषय है", "विचार करने योग्य", "गंभीर विचार की आवश्यकता","विचारोत्तेजक लेख पर बधाई"."मैं आपसे सहमत/असहमत हूं","सुन्दर प्रयास और लेखन","पूरी तरह सहमत/असहमत","संवेदनशील होने की आवश्यकता है"

अब थोड़ी सी लम्बी टिप्पणियों की तरफ भी एक नजर डालिये, "एक बहुत ही अच्छे मुद्दे को उठाया है, साधुवाद","इस गंभीर विषय पर आपने बहुत सशक्त लेख लिखा है, बधाई","पढ़कर आनन्द आ गया", "आप यूं ही निरन्तर लिखते रहें","इस विषय को आपने बहुत गहराई से छुआ है","जितनी भी निन्दा की जाये कम है", "विषय के हरएक पहलू पर कलम चलाने के लिये आपको बधाई","इस आलेख को पढ़कर बहुत आनन्द आया".,"बहुत ही मार्मिक और संवेदनशील"

अब आप चाहे तो पूरा लेख पढ़कर उपरोक्त टिप्पणी करें या फिर बिना पढ़े, मजाल है कि लेखक कह सके कि पाठक ने बिना पढ़े ही टिप्पणी की है. और इसका प्रयोग आप मेरी इस नन्हीं सी पोस्ट के साथ कर सकते हैं.

अब इसे क्लेमर कहा जाये या डिस्क्लेमर, बहरहाल मैं सभी टिप्पणी देने वाले विज्ञजनों से और उन विज्ञलेखकों से क्षमा चाहता हूं, जिन्होंने मेरे ब्लाग पर टिप्पणियां की हैं या जिनके ब्लाग पर मैंने टिप्प्पणी की है और इन शब्दों/टिप्पणियों का प्रयोग किया है. यह महज रसास्वादन के लिये है कृपया अन्यथा न लें. दर-असल ज्ञानजी के ब्लाग पर ब्लाग के पठन-पाठन से सम्बन्धित एक लेख था और वहीं से मेरे मन में यह विचार/(कु)विचार आया. इस विषय पर श्री अनूप शुक्ल जी और विवेक रस्तोगी जी बहुत अच्छा लिख चुके हैं. कुछ टिप्पणियां मेरे मन में आईं जो आपके सामने हैं.  तो फिर हो जाये एक टिप्पणी बिना पढ़े :-)

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