क्या सारे मुसलमान आतंकवादी हैं?

पेश-ए-खिदमत है एक माइक्रो पोस्ट - शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली दिल्ली की कांग्रेस सरकार चार वर्षों से अफजल गुरू की फांसी की सजा की फाइल, जिसमें दिल्ली सरकार को अपनी राय देना थी, दबाये रखी रही.  जब अजमल कसाब की फांसी की सजा को लेकर हो-हल्ला हुआ तो इस मामले को खंगाला गया. शीला दीक्षित पहले मना करती रहीं कि गृह मंत्रालय से उन्हें ऐसा कोई पत्र नहीं प्राप्त हुआ लेकिन अब रातोंरात पत्र भी मिल गया उसका जबाव भी चला गया, फिर उस पर आपत्ति लगी और तुरन्त ही उस आपत्ति का जबाव भी दे दिया गया. शीला जी ने यह भी लिखा था कि अफजल को फांसी की स्थिति में कानून-व्यवस्था का मसला भी देख लिया जाये. दो दिन के अन्दर इस तरह की हां-ना, और इस तेजी से पत्र पाना, उत्तर भेजना, ये परिस्थितियां एक संदेह उत्पन्न  करती हैं. जाहिर है कि इस प्रकरण को किसी और जगह से निर्देशित किया जा रहा है. एक प्रश्न जो सरकार संसद पर हमले के अभियुक्त को फांसी की स्थिति में कानून व्यवस्था नहीं संभाल सकती वह दिल्ली के करोड़ों नागरिकों की सुरक्षा कैसे कर सकती है. दूसरा प्रश्न यह कि क्या राजनीतिबाजों को यह लगता है कि यहां के सारे मुसलमान आतंकवादी हैं? यदि वे सारे मुसलमानों को आतंकवादी मानते हैं तो फिर कानून-व्यवस्था का प्रश्न अपनी जगह ठीक है. लेकिन यदि ये लोग ये मानते कि आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता और एक आम मुसलमान का इससे कोई लेना देना नहीं है तो फिर कानून-व्यवस्था का प्रश्न नाजायज है. क्या अफजल या अजमल को फांसी होने पर सारे मुस्लिम कानून को अपने हाथ में ले लेंगे? कई प्रबुद्ध मुस्लिम व्यक्ति स्वयं इन नराधमों के लिये जल्द-से-जल्द फांसी पर चढ़ाने की मांग कर चुके हैं. अफजल को तो ये लोग ऐसे पेश कर रहे हैं मानो कि वह मुसलमानों का रोल माडल हो. इन राजनीतिबाजों के कारण ही मुस्लिमों की छवि खराब हो रही है. 

सुल्तान अहमद, वही तृणमूल कांग्रेस के मन्त्री जी, जिनके ऊपर अशोका होटल का सैंतीस लाख रुपये का बिल निकल रहा था और जनाब टेलीविजन पर इस खर्च को चुकाने का वायदा कर रहे थे, अभी तक बिल नहीं चुका पाये हैं. हालांकि उस समय मियां जी ने यह गलती अपने अधिकारियों पर मढ़ दी कि उन अधिकारियों ने उन्हें गलत सूचना दे होटल में टिका दिया.

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