हिन्दी के ब्लाग क्या केवल एक-दूसरे की टांग खींचने और गरियाने के साधन बन चुके हैं?

पिछले कई दिनों से बल्कि महीनों से हिन्दी के ब्लाग लेखक आपस में गुत्थम-गुत्था हुये जा रहे हैं. कभी एक नम्बर की पदवी को लेकर तो कभी ब्लाग की रैंकिंग न सुधरने पर तो कभी गुटबाजी को लेकर. कौन किस गुट का है, कहां का मठाधीश है, किस धरती से सम्बन्धित है. अब ब्लागर्स मीट को लेकर दिक्कत पैदा हो गयी है. लोग आपस में एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं. फर्जी आई-डी बना-बनाकर एक दूसरे को गरियाने का वह सिलसिला चल निकला है कि कई बार तो खुद ही बड़ी आत्मग्लानि सी होने लगती है. इतने बड़े नाम, इतना अच्छा काम और फिर एकदम इस स्तर पर पहुंचना. इस सबसे क्या सिद्ध करना चाहते हैं हम लोग. हिन्दी ब्लाग्स पर ढ़ेरों साहित्यिक कृतियां मौजूद हैं. लोग इतना अच्छा लिखते हैं कि पढ़ने के बाद मालूम चलता है कि वास्तव में मैं कूप-मंडूक ही था, एक इतनी विशाल दुनिया है हिन्दी ब्लाग. लेकिन इतना सब कुछ होने के बाद जब ब्लागर्स इन चीजों को लेकर आपस में उलझ जाते हैं तो वाकई में दुख होता है. इतनी अपरिमित ऊर्जा का ऐसा दुरुपयोग! मैं फिर से आप सभी से प्रार्थना करूंगा कि इस ऊर्जा को सही दिशा में लगने दें, न कि रैंकिंग, गुटबाजी और मठाधीशी इत्यादि को लेकर एक दूसरे की टांग-खिंचाई में जाया होने दें.

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