तालिबानी क्या इसका उत्तर देंगे....

पुराना लिखा हुआ है. कुछ प्रचारक बड़े तीखे हमले कर रहे हैं,  मैंने भी इनका लिखा हुआ पढ़ा है. कुछ लोग बड़े प्रश्न लेकर मैदान में उतरे हुये हैं कि ऐसा होता तो क्या होता, यूं होता तो क्या होता. मुझे इनके बारे में अधिक कुछ लिखने की आवश्यकता महसूस नहीं होती.  खैर कुछ सवाल मेरे दिमाग में भी उमड़ने-घुमड़ने लगे थे जो एक लेख के रूप में प्रकाशित कर चुका हूं और वही सवाल फिर आप के आगे परोस रहा हूं. दुबारा प्रकाशित कर रहा हूं इसलिये क्षमा करें लेकिन आप लोगों के पास इसका उत्तर है क्या ? ये प्रश्न मुख्यत: उन तालिबानियों के लिए है जो फिरदौस जी, महफूज जी जैसे लोगों के ऊपर उनके सम्यक विचारों को लेकर निरन्तर हमले करते रहते हैं..

 कुछ लोगों ने मेरे कुछ आलेख पढ़कर मुझे धर्मांध हिन्दू के रूप में परिभाषित कर दिया और कुछ ने जातिवाद का समर्थक बताया लेकिन ऐसा नहीं है, बिल्कुल भी नहीं। मैं बिल्कुल कट्टर नहीं हूँ और न ही जातिवादी प्रक्रिया का समर्थक। मेरा अपना मानना यह है कि किसी भी बच्चे के पास यह अधिकार नहीं होता कि वह यह फैसला कर सके कि उसे किस व्यक्ति के यहाँ पैदा होना है। जन्म लेना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो भी बच्चा पैदा हो रहा है, वह जिस किसी भी धर्म या जाति से सम्बंधित व्यक्ति के यहाँ पैदा होता है, उस बच्चे को वही धर्म या जाति स्वत: ही मिल जाती है। अब इसके बाद उस बच्चे के मस्तिष्क में क्या भरा जाता है, यह एक अलग विषय है।

सभी धर्मों के विद्वान व्यक्ति यही कहते हैं कि कोई भी धर्म निर्दोषों की जान लेना नहीं सिखाता, हो सकता है यह सत्य हो, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि धर्म के कारण ही कुछ बड़े रक्तपात भी हुए हैं। मेरा अपना मानना है कि एक साथ पैदा हुए दो-चार-आठ (कोई भी संख्या ले लीजिये) बच्चों को देखकर या कोई भी वैज्ञानिक प्रयोग कर उसकी जाति या धर्म को निश्चित नहीं किया जा सकता। मैं दलित व्यक्ति के घर पैदा हुआ तो दलित बन गया, अगर ब्राह्मण के यहाँ पैदा होता तो ब्राह्मण बनता (यदि जाति व्यवस्था को स्वीकार करें तो ), अगर सिख के यहाँ पैदा होता तो सिख बनता, मुस्लिम के यहाँ पैदा होता तो मुसलमान बनता (वैसे एक राज की बात बताता हूँ, मेरी प्रेमिका जो धार्मिक कारणों से डरकर मेरा साथ न दे सकी, एक अन्य धर्म की ही थी) । यह भी एक अकाट्य तथ्य है कि यहाँ के अधिकतर अल्पसंख्यक (यदि कहना चाहें तो, अन्यथा इस धरती का प्रत्येक व्यक्ति एक व्यक्ति है न कि अल्प और बहु संख्यक समुदाय का घटक) कहीं न कहीं बहुसंख्यकों से ही शाखित हैं, उन्हीं के एक अंग हैं।

यदि बात अगड़ों और पिछडों या फिर दलितों की करें तो यह बड़ी अफसोसजनक स्थिति है। पुराने वेदों तथा पुरानों से यह स्पष्ट हो जाता है कि जो वर्ण - व्यवस्था थी, वह चक्रीय थी, मनुष्य की स्थिति उसके आचरण तथा कर्म के अनुसार ऊपर नीचे होती रहती थी। शूद्र से ब्राह्मण, ब्राह्मण से शूद्र, क्षत्रिय से ब्राह्मणत्व को प्राप्त होने के अनेक उदाहरण हमारे साहित्य में पाये जाते हैं, किंतु बड़े खेद के साथ कहना पड़ता है कि वोट बैंक की राजनीति के चलते हमारे सभी राजनेताओं ने मैकियावलीयन राजनीति की कुटिलताएं सीख ली हैं तथा फूट डालो और राज करो की नीति में भी पूरी तरह पारंगत हो गए हैं। इन कुटिल राजनीतिज्ञों ने समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु ऐसी लम्बी विभाजक रेखाएं खींच दी हैं, जिन्हें मिटाकर छोटा नहीं किया जा सकता, बल्कि उनसे बड़ी विभाजक रेखा खींच कर ही छोटा किया जा सकता है।

वैसे अगर ईश्वर, खुदा, भगवान की बात करें तो मुझे कुछ धार्मिक विद्वानों की बातें समझ में नहीं आतीं, जैसे कि अगर में अपना धर्म बदल कर दूसरे धर्म में चला जाऊं तो दूसरे धर्म वाला ईश्वर मेरी दिक्कतों को दूर कर देगा। यह लोग ख़ुद ही कहते हैं कि उपरवाला एक है, आम आदमी से पूछो तो वह भी कहता है कि ऊपर वाला एक है, लेकिन अगर एक है तो अगर मुसलमान मन्दिर में चला गया तो धर्मभ्रष्ट कैसे हो गया। अगर हिन्दू चर्च में चला गया या मस्जिद में चला गया तो धर्मभ्रष्ट कैसे हो गया। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि या तो सब धर्मों के ईश्वर भी अलग-अलग हैं जो अपने-अपने धर्मों के मानने वालों की ही समस्या का निदान करते हैं, और जो लोग यह कहते हैं कि उपरवाला एक है वे झूठ बोलते हैं।

लेकिन यह भी सही नहीं हो सकता, वह इसलिए कि अगर ईश्वर अलग-अलग होते तो उनमें भी लड़ाई होती, वे भी हमारी तरह ही लड़ रहे होते, और किसी एक धर्म के ही लोग इस दुनिया में बाकी रह गए होते। लेकिन ऐसा तो आज तक नहीं हुआ, कोई मरने वाला दोबारा लौटकर यह बताने नहीं आया कि ऊपर उसे नर्क में डाला गया या हूरें दी गयीं। फिर सही बात क्या है, जिस हिन्दू ईश्वर ने हिन्दू बनाये तो उसने गाय, भैंस, बकरी, घोड़े, कुत्ते, फल, सब्जियां, खाद्य-पदार्थों में हिन्दू गाय, हिन्दू भैंस , हिन्दू फल, हिन्दू सब्जियां क्यों नहीं बनाईं, जिसने मुसलमान बनाये, उसने मुस्लिम गाय, मुस्लिम भैंस, मुस्लिम पानी, मुस्लिम हवा क्यों नहीं बनाई, जिसने सिख बनाये, उसने सिख आसमान क्यों नहीं बनाया, जिसने शूद्र बनाये, उसने शूद्र आम, शूद्र पानी क्यों नहीं बनाया, जिसने ब्राह्मण बनाये, उसने ब्राह्मण धान, ब्राह्मण गेंहू क्यों नहीं बनाया? है कोई जवाब आपके पास?

मैं जानता हूँ नहीं है, लेकिन क्या करेंगे आप इस पोस्ट को पढ़ने के बाद, थोड़ी बहुत देर सोचेंगे और फिर दिमाग से निकाल देंगे, क्योंकि अगर इस पोस्ट को दिमाग में रखेंगे तो दिमाग दर्द करने लगेगा, आपको अन्दर तक झकझोरेगा और कुछ करने के लिए उकसायेगा, लेकिन फिर घूम-फिर कर वापस वहीं आ जायेंगे, जहाँ से चले थे, कि हमें क्या पड़ी है, जैसा सबके साथ होगा, वैसा हमारे साथ होगा। सही कहा न मैंने।

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