जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं के तीर्थ स्थलों की यात्रा मंहगी हुई...

यह खबर नवभारत टाइम्स  पर मौजूद है.

वैष्णोदेवी और अमरनाथ के दर्शन अगले महीने से उन लोगों की जेब पर कुछ भारी होने जा रहे हैं, जो अपनी प्राइवेट गाड़ियों से इस सफर पर निकलते हैं।
जम्मू-कश्मीर सरकार ने गुरुवार को कहा कि जो लोग माता वैष्णो देवी या अमरनाथ यात्रा पर अपनी गाड़ियों से जाते हैं उनसे एंट्री फीस के तौर 2000 रुपये वसूले जाने चाहिए। इस बारे में राज्य सरकार ने जम्मू-कश्मीर मोटर वीकल टैक्सेशन एक्ट 1957 के तहत नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है। इसमें कहा गया है कि तीन दिन के लिए वैष्णोदेवी की यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं से 2000 रुपये एंट्री पॉइंट पर ले लिए जाएं। अगर वे तीन दिन से ज्यादा रुकते हैं तो प्रतिदिन के हिसाब से 2000 रुपये लिए जाएं।
इसी तरह अमरनाथ यात्रा के लिए जाने वालों के लिए कम से कम 7 दिन तय किये गए हैं यानी अगर श्रद्धालु अपनी गाड़ियों से सिर्फ 7 दिन या इससे कम के लिए जाते हैं तो उनसे एंट्री पॉइंट पर 2000 रुपये लिए जाएं और 7 दिन के बाद भी वहां रुकते हैं तो प्रतिदिन के हिसाब से 2000 रुपये वसूले जाएं। इस साल अमरनाथ यात्रा 1 जुलाई से शुरू हो रही है।
 
जम्मू कश्मीर के लिये हजारों करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की गई, बावजूद कि प्रधानमन्त्री के कश्मीर दौरे को लेकर कुछ गुमराह लड़कों ने पत्थरबाजी की. अतिश्योक्ति न होगा यदि कहा जाये कि कश्मीर  को बाकी भारत के करों पर पाला जा रहा है. हिन्दुओं को घाटी से भगाया जा चुका है और अब कहा जाता है कि वे खुद चले आये, रुके क्यों नहीं. एक बिल यह भी आ गया है या आने वाला है जिसमें यह कहा जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर से बाहर शादी करने वाली महिलाओं की वहां की नागरिकता खत्म हो जायेगी. जाहिर है कि इसका मुख्य प्रभाव घाटी के हिन्दुओं पर पड़ेगा. हज पर सब्सिडी दी जाती है, सबको मालूम है और कोई विरोध नहीं होता. चर्च/ईसाईओं को भी देश के कुछ राज्यों में राज्य से सहायता देने की खबर सुनने में आई. दक्षिण भारत और आंध्र प्रदेश में सुविधा बढ़ाने के नाम पर हिन्दू तीर्थ यात्रियों पर कर लगाया गया.
 
जो लोग तीर्थाटन पर जाते हैं वे स्थानीय निवासियों को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मुहैया कराते हैं तथा उनकी आर्थिक उन्नति में भी योगदान देते हैं. इस स्थिति में जब हर वर्ष लाखों लोग वैष्णो देवी तथा अमरनाथ यात्रा पर जाते हैं, इस तरह के कदम यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि यदि इसी प्रकार से हिन्दुओं के साथ कराधान का कार्यक्रम चलता रहा तो निस्संदेह लोगों में इन स्थानों के प्रति बेरुखी उत्त्पन्न होगी. प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक दल हिन्दुओं के तीर्थों को इस तरह से निशाना बनाकर किस लक्ष्य की प्राप्ति करना चाहते हैं? प्रश्न विचारणीय भी है और बहुत गंभीर भी. 
 

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