मेरे शहर के आटो
कभी बैठकर देखिये मेरे शहर के आटो पर. क्या खूब हैं, बढ़िया हरा रंग, जिस पर काले रंग से सुशोभित होता है "CLEAN CITY GREEN CITY". और इस हरे रंग तथा इन शब्दों के सहारे शहर ग्रीन भी हो रहा है और क्लीन भी. दरअसल पेड़-पौधों के कटने से पर्यावरण में हरियाली में जो कमी आयी है, उस कमी की पूर्ति आटो और बसों को हरा रंग कर पूरी की जा सकती है. जिधर भी देखिये हर तरफ क्लीन और ग्रीन ये दो शब्द ही दिखाई देते हैं और इस तरह पर्यावरण भी दूषित होने से बच जाता है तथा प्रदूषण नियन्त्रण वालों का भी काम आसान हो जाता है. आटो के नीचे से धुंआ भले ही काले रंग का निकलता हो लेकिन आटो का रंग हरा होने से पर्यावरण दूषित नहीं होता है, इसी सिद्धान्त के चलते प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के लोग अन्य कार्यों पर अपना ध्यान बखूबी केन्द्रित कर पाते हैं. इस के साथ ही इनके इंजनों से जो आवाज निकलती है वह किसी शास्त्रीय संगीत से कम नहीं होती, पता नहीं लोग क्यों शोर की शिकायत करते हैं जबकि सुन्दरता देखने वाले की आंखों में होती है, के अनुरूप ही संगीत सुनने वाले के कानों में होता है, एक निश्चित सिद्धान्त है. आटो के इंजन से निकलती हुई विभिन्न आयामों की आवाजें जो कभी द्रुत तो कभी मंद लय में प्रत्यक्ष गुंजायमान हो इस सिद्धान्त का प्रमाण उपलब्ध कराती हैं. इन आटो चालकों के संगीत प्रेम का परिचय इनमें लगे हुये हार्न से ही पता चल जाता है. तन डोले-मन डोले, हट जा ताऊ, तेरा सरापा और न जाने कितने गाने इस हार्न के बटन को दबाते ही प्रकट हो जाते हैं और तब तक प्रकट होते रहते हैं जब तक कि आगे जाने वाले को दुर्घटनाग्रस्त होने से बचाने का पुण्य अपने नाम न कर लें. सबै भूमि गोपाल की, के सिद्धान्त पर अमल करते हुये ये पूरी सड़क पर स्वच्छन्द विचरण करते रहते हैं. आजादी का सही अर्थ तो आटो पर बैठ कर ही समझा जा सकता है. जो बन्दा आटो पर नहीं बैठा, वह आजादी का मतलब नहीं समझ सकता. जब चाहो आटो के ब्रेक लीवर पर पैर रख कर रोक दो, जिस दिशा में चाहो मोड़ दो, जब चाहे आगे गति दे दो. मानो आटो की गति ही देश की गति है और देश की गति आटो की. आटो का ड्राइवर किसी महान राजनेता से कम नजर नहीं आता. कब देश को गति देना है, किस मोड़ पर धीमा होना है, कहां रुकना है और कहां आगे बढ़ने का भ्रम उत्पन्न करना है. बिल्कुल उसी तरह वह आटो को गति देता रहता है. कब यह दांये मुड़ जाये और कब बांये, आपको तभी पता चलता है जब आप इससे टकराने से बचते हैं, और ऐसा करने का मकसद होता है आपकी चुस्ती, फुर्ती और आंखों के नूर को नापना, परखना और बनाये रखना. आप को लगेगा ही नहीं कि आप देश में न होकर आटो में सवार हैं. उसकी दृष्टि किसी महान भविष्यदृष्टा से कम तेज नहीं होती. वह मीलों दूर से सवारी को ताड़ता रहता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई घिसे हुया राजनेता अपने वोटरों को ताड़ता है.
उसका धैर्य भी कमाल का है, सवारी मिले न मिले (वैसे ही जैसे वोट मिले न मिले, लेकिन चुनावों के समय हर नेता वोटरों के आगे कालीन बनने को उद्यत होता है) उसका परम धर्म है हर संभावित सवारी के सामने आटो को धीमा कर चढ़ने का न्यौता देना. यदि सरकारें थोड़ा सा ध्यान दें तो नगरों में आवास की समस्या चुटकी बजाते ही हल हो सकती है. तीन सीट के आटो पर आठ और आठ सीट वाले पर अठारह लोगों को जिस खूबसूरती से फिट किया जाता है यदि उसी प्रक्रिया को आवास की समस्या के खांचे पर फिट कर दिया जाये तो आवास की समस्या का समूल नाश हो जायेगा. जैसे प्रगति की राह पर दौड़ रहे देश की राह में कोई समस्या रुकावट नहीं बन सकती उसी प्रकार दौड़ते हुये आटो की राह में फुट भर गहरे गड़्ढे, और इतने ही ऊंचे स्पीड ब्रेकर भी रुकावट नहीं डाल सकते. किसी राजनैतिक दल के आवाज देते हुये मैनिफेस्टो की तरह ही आटो चालक आपको अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता, मंजिल पर बस यूं चुटकी बजाते हुये पहुंचाने का आश्वासन देते समय किसी राजनीतिक दल के प्रवक्ता की याद बरबस ही दिला देता है जो भारत को स्वर्ग और भारतवासियों को स्वर्गवासी बनाने का आश्वासन देता है. बस एक बार कदम भर धरने की देर है कि स्थिति बिल्कुल जीती हुई पार्टी की तरह हो जाती है जिसे अब आपको पांच साल तक झेलना ही होता है. आटो में बैठने भर से आपको विदेशी कूटनीति और बंग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या का ज्ञान हो जाता है. जिस सीट पर आप बैठे थे उस पर धीरे धीरे चार लोग और बिठा दिये जाते हैं (चाहे वह सीट तीन लोगों भर की ही हो) और फिर आपको लगने लगता है कि बंगलादेशी घुसपैठिये किस तरह से कब्जा जमा लेते हैं.
आटो में बैठने भर से आप की उस धारणा का खंडन हो जाता है जो आपको यह बताती है कि पुलिस आम आदमी के प्रति निर्दयता से पेश आती है. यदि ऐसा होता तो वह निश्चित ही आम आदमी को उस टैम्पो से यात्रा न करने देती जो अठारह लोगों को बिठाकर पुलिस चौकी के सामने से गुजरता है. ऐसा कर पुलिस आम आदमी को अपने गंतव्य पर समय से पहुंचने देती है जो निश्चित ही एक अच्छी बात है. आटो वाला भी आम आदमी है और पुलिस वाला भी. दोनों ही आम हैं. दोनों एक दूसरे के प्रति समर्पित हैं. और इस समर्पण का सबूत होता है वह प्रमाणपत्र जो आरबीआई के गवर्नर द्वारा दिये गये वचन के रूप में होता है और जो आटो वाला पुलिस वाले को देता है. और यही समर्पण का भाव परिवहन विभाग वालों के साथ भी निभाया जाता है. कौन कितना समर्पित है, इस समर्पण को देखने के लिये परिवहन वाले आधी रात में भी अपनी नींद को समर्पित कर मार्ग पर उतर आते हैं. जो इस समर्पण का सबूत पेश कर देते हैं वह अपने गंतव्य पर निर्विघ्न रवाना हो जाते हैं और जो सबूत प्रस्तुत नहीं कर पाते उनके वाहनों को शासन के समक्ष समर्पित कर दिया जाता है.
जिस किसी ने टैंक बनाया होगा, वह अवश्य किसी आटो का चालक रहा होगा. हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े-लिखे को फारसी क्या. आटो के चारों तरफ लोहे का एक सुरक्षा कवच सा लगा रहता है जो बगल से गुजरने वाले स्कूटर, मोटरसाइकिल और कार इत्यादि को "जो हमसे टकरायेगा, चूर चूर हो जायेगा" का संदेश देता रहता है. और जिस किसी ने इस चेतावनी को "इस खत को ग्यारह लोगों को अवश्य भेजना, न भेजने पर काफी नुकसान उठाना पड़ेगा" टाइप का समझकर साइड देने में जरा सी भी भूल की तो अविलम्ब उस पर आटो को साइड न देने की हिमाकत के निशानी उभर आती है. यह सुरक्षा कवच एक काम और भी करता है. जो थोड़े हट्टे कट्टे युवा होते हैं और शूरवीर भी तथा जान हथेली पर लेकर चलने में अपना सानी नहीं रखते, उन्हें जानिबे-मंजिल ले जाने का काम भी इस सुरक्षा कवच के जरिये किया जाता है. आटो का चालक भी शूमाकर से कम नहीं होता. बस आगे का एक पहिया घुस भर जाये. एक सीट के छोटे से, लगभग चार इंच के टुकड़े पर अपनी तशरीफ रखकर क्या खूब चलाता है आटो को, बिल्कुल गठबंधन सरकार की तरह. कभी कभी तो संदेह होता है कि कहीं चालक के रूप में प्रभु ही तो नहीं आ गये. हमारे देश के प्रबुद्ध बालकों की तरह जो मौलिक विचारों के उत्पादन में अपना सानी नहीं रखते जो ट्रक पर लिखे "साइड मिलने पर पास दिया जायेगा" में एक अक्षर "प" को ध" में बदलकर अपनी मौलिकता का परिचय देते हैं, उसी प्रक्रिया का पालन आटो वाले करते हैं. जिंदगी का फलसफा भी आटो में बैठकर समझ में आ जाता है जब आटो वाला साठ की स्पीड से भीड़ भरी राहों में दौड़ाता है तो हर किसी को अपने इष्टदेव याद आ जाते हैं और यह भी समझ में आ जाता है कि यह दुनिया फानी है कम से कम तब तक तो लगता ही है जब तक मुसाफिर आटो से उतर नहीं जाता.
तो एक बार आईये न.....
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