न केवल जातिगत बल्कि धर्मगत तथा आर्थिक गणना भी होना चाहिये

लोग बड़े खफा हैं. जातिगत आंकड़े होना चाहिये या नहीं. ब्लागर भी कहां पीछे हटने वाले. सो नहीं हटे. जितने मुंह उससे कहीं अधिक बातें. खैर मेरी सीधी सी एक बात है. जातिगत गणना भी होना चाहिये, धार्मिक भी और आर्थिक भी. लोगों को जानना चाहिये कि इस देश में किस जाति और किस धर्म के कितने लोग रहते हैं, उनकी आर्थिक हालत क्या है. कितनों को आरक्षण से क्या लाभ पहुंचा और कितना. किस जाति को पहुंचा किसे नहीं पहुंचा. किसने पूरा लाभ उठाया और कई पीढ़ियों ने उठाया, किस की कई पीढ़ियों में किसी को भी नहीं मिला. कौन वास्तव में आरक्षण का हकदार बनता है और कौन नहीं. नेता भी अपने जातिगत-धर्मगत समीकरण और सहूलियत से मिला सकेंगे. चूंकि इस देश और देश में रहने वाले मानव रूपी जन्तुओं का भाग्य बन चुका है बंटवारा, इसलिये इस जनगणना के आधार पर तीन प्रशासनिक हिस्से किये जा सकते हैं. एक धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिये, एक आरक्षितों के लिये और एक अनारक्षितों के लिये. 

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