क्वीन्स बेटन का आना
क्वीन्स बेटन आ रही है. शहर मुस्तैद है. चकाचक झकास वर्दी में पुलिस वाले. ट्रैफिक को संभालते, न जाने अभी तक कहां छुपे बैठे थे. सड़कों के गड्ढ़े भी बराबर भरे जा रहे हैं. सफेदपोश निकल आये हैं, बुर्राक सफेद कपड़ों में. धनपतियों ने पोस्टर छपवा दिये हैं क्वीन्स बेटन के स्वागत में. प्रायोजक कम्पनियां अपने हाईली-पेड कर्मचारियों को अपने उत्पादों के साथ स्वागत में दौड़ा रही हैं. शहर में दीवानगी छा गयी है. क्वीन्स बेटन. लगता है जैसे कि यह एक जादू की छड़ी है जिसके आते ही सारी परेशानियां छू-मंतर होने जा रही हैं. अब न मंहगाई रहेगी, न कोई भूखों मरेगा. न हारी की चिन्ता न बीमारी की. बेरोजगारी का खात्मा होने ही वाला है. सड़क घेर कर प्रारम्भ में केंचुये और बाद में सर्प बन जाने वाले दुकानदार भी आज नहीं दिखाई दे रहे. पुलिस और प्रशासनिक अफसर बड़े मुस्तैद हैं. आम जनता के काम शायद ही कभी इतनी मुस्तैदी से किये होंगे. वही सड़क जिस पर ये बेटन गुजरेगी, चमक रही है. गड्ढे भर दिये गये. चूना डाल दिया गया है. स्वनाम-धन्य लोग बेटन के इन्तजार में एकत्रित हैं. आखिर यही तो गौरव हैं शहर के. वह किसान जो अपनी हड्डी तक गला देता है खेत में और कर्ज के तले दबा रहता है, शायद इस काबिल नहीं होता और होना भी नहीं चाहिये. मजमा जुड़ गया है. शहर, देश और प्रदेश के भार को कन्धे पर ढ़ोने की महती जिम्मेदारी उठाये हुये लोग टहल रहे हैं. सिपाही रिक्शेवाले की पीठ पर डन्डा चटका रहा है. दरोगा के हाथों में भी खुजली मच गयी, उसने भी दो हाथ जमा दिये. विक्टोरिया महारानी के खेलों की बेटन है कि मजाक. भूख-गरीबी-बेरोजगारी-भ्रष्टाचार-साम्प्रदायिकता-अन्याय की चिन्ता मत करो. यह तो रोज का किस्सा है. और कमबख्त नसीब है. बात करो बेटन की. रात की पार्टी की, जो बेटन के गुजरने के बाद परवान चढ़ेगी. सारी चीजें वहीं डिस्कस होंगी. सड़क बनाने वाला ठेकेदार और अब गड्ढे भरवाने वाला, सार्वजनिक निर्माण विभाग के बड़े साहब. दारू के ठेके लेने वाला ठेकेदार जो दस प्रतिशत प्रीमियम पर दारू बिकवाता है. सब बड़ी धीर-गम्भीर मुद्रा में विचारमग्न हैं. आखिर बेटन आने वाली है न. एक पत्रकार भी हैं जिनसे हर कोई डरता है.
समाधान भी तो खोजना है इतनी सारी समस्याओं का. कैसे लड़ना है भूख से, यह दो हजार रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से होने वाली दावत में ही तय किया जा सकता है. गरीबी, बेरोजगारी, धरना-प्रदर्शन, गरीबों के हक में किस डेट को किस चौराहे पर प्रदर्शन करना है, किस जगह मानव श्रॄंखला बनानी है, यह तय भी तो किया जाना बाकी है. रोज साठ-सत्तर हजार रुपये कमाने वाले डाक्टर साहब अपने चैरिटेबल ट्रस्ट के तहत गरीबों के लिये फ्री कैम्प लगाने की व्यवस्था भी डिस्कस करेंगे. कैसा अद्भुत समाजवाद लाई है बेटन. अतिक्रमण करने और कराने वाले शहर के नेताजी, उसे हटाने के लिये जिम्मेदार पुलिस-प्रशासनिक अधिकारी (जो इस आधार पर कभी नहीं हटाते कि कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा है, यह बात अलग है कि जब उनकी गाड़ी कहीं फंस जाती है तो आनन-फानन में इसे हटा दिया जाता है) दोनों साथ-साथ खड़े हैं. एक नेता जिनके खिलाफ अदालत से कई बार गैर-जमानती वारंट जारी हो चुका है, पुलिस अधीक्षक महोदय के साथ वार्ता में मशगूल हैं. एक लैण्ड डवलपर (सही भाषा में भूमाफिया) टर्न्ड पालिटिशयन भी इस जमात का हिस्सा हैं. मिलावट के महारथी और अब शहर की शान, जो पूरे शहर को झण्डे-बैनर से पाट चुके हैं, बड़ी बेकरारी से बेटन के इन्तजार में इधर से उधर टहल रहे हैं. जोड़-तोड़ के महारथी रहे खिलाड़ी जिन्होंने कई होनहारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया, वे भी हैं, और कुछ जेन्युइन खिलाड़ी भी हैं. सब अपने में मगन. तो भैया बेटन देखो, बेटन का सपना देखो और यह भी देखो कि कितनी जल्दी बाढ़-अकाल-सूखा-गरीबी-भूख-बेरोजगारी-बीमारी छूमंतर होती है, बस जरूरत है हर आदमी को एक अदद बेटन दिये जाने की.
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