पहले गुर्जर और अब जाट

पहले गुर्जर और अब जाट. आरक्षण को लेकर फिर हंगामा. एक बार फिर वही प्रक्रिया दोहराई जायेगी जो राजस्थान में गुर्जरों और सरकार द्वारा अपनाई गई थी. बात घूम-फिर कर वहीं आ जाती है, जहां से शुरू होती है. आखिर आरक्षण को लेकर यह अंधी दौड़ कहां जाकर खत्म होगी. दर-असल आरक्षण का लाभ वास्तव में जिन्हें मिलना चाहिये उन्हें आज भी नहीं मिला है. यह पूरी प्रक्रिया ही फूलप्रूफ नहीं है. जातिगत अनहर्ताओं को खत्म करने के लिये गये प्रावधानों के राजनीतिबाजों द्वारा किये गये भरपूर दुरुपयोग से जातिगत वैमनस्यता को खूब बढ़ावा मिला है. धर्म, जाति और भाषा तथा कबीलाई संस्कृति के अन्य तत्वों के समागम से राजनीतिबाजों ने एक ऐसा भस्मासुर पैदा कर दिया है जो एक दिन खुद उन्हें ले डूबेगा, बस थोड़े समय का इन्तजार करना पड़ेगा. आरक्षण के द्वारा हर कोई एक बाईपास चाहता है सरकारी नौकरी में जाने का. कल गुर्जर थे, आज जाट हैं, कल कोई और जाति होगी. कुछ प्रदेशों में वोट-बैंक की खातिर मुस्लिमों को भी आरक्षण दिया जा चुका है. अब यह मुद्दा जिस स्थिति में पहुंच चुका है वहां से पीछे लौट सकना तो मुमकिन है ही नहीं. ऐसे में एक मात्र यही रास्ता बचता है कि हर जाति-धर्म की जनसंख्या के आधार पर सभी को आरक्षण दे दिया जाये. अगर उसके बाद कुछ बच जाये तो राजनीतिबाजों की औलादों के लिये आरक्षित कर दिया जाये. देश की जड़ों में बारूद तो भर ही दिया है इन राजनीतिबाजों ने. तिल-तिल कर मरने की जगह एक झटके में ही मर जाना मरीज और उसके परिवारीजनों के लिये हमेशा अधिक अच्छा होता है.

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