टीवी सीरियलों तथा विज्ञापनों के नाम फैलाई जा रही अश्लीलता..

टेलीविजन का रिमोट जब हाथ में होता है तो अक्सर ही डिस्कवरी या नेशनल जियोग्राफिक देखने के लिये सास-बहू चैनलों से आगे पीछे जाने के लिये बटन दबाना पड़ जाते हैं. आज ऐसे ही करते समय अचानक एक दृश्य सामने आ गया. यह दृश्य वी टीवी के एक प्रोग्राम "गेट गार्जियस" का था. यद्यपि मैं इस तरह के दृश्य वाले चैनल को स्किप कर देता हूं, लेकिन इस पर एक बड़ा ही विस्मयकारी या फिर कह लीजिये कि अट्रैक्टिव कैप्शन आ रहा था. इस कैप्शन की इबारत का तजुर्मा कुछ इस प्रकार था कि "गेट गार्जियस के पूरे अन्सेन्सर्ड दृश्यों को देखिये ....../......./  पर. हालांकि जो दृश्य उस समय आ रहा था वह भी कम खतरनाक नहीं था. दो लड़के और एक लड़की पत्ते से लपेटे हुये एक पेड़ पर एक दूसरे से लिपटे हुये खड़े थे और इस दृश्य को कैमरे शूट किया जा रहा था. जब पूरे देश में प्रसारित होने वाले कार्यक्रम में ऐसे दृश्य दिखाये जा रहे हैं तो अन्दाजा लगाना कठिन नहीं कि ......./........./ पर किस तरह के दृश्य उपलब्ध होंगे. आजकल युवाओं में इस तरह के टीवी कार्यक्रमों के लिये बेइन्तहा दीवानगी है, इसलिये इस पीढ़ी को किस ओर धकेला जा रहा है, इस की कल्पना ही सिहरा देती है.  

टेलीविजन पर एक से बढ़कर एक विज्ञापन आते हैं. फेविकोल के विज्ञापन क्रियेटिविटी के शानदार उदाहरण हैं.  लेकिन कुछ विज्ञापन ऐसे हैं जिनका उद्देश्य समझ में नहीं आता. एक विज्ञापन है एक डिओडेरेन्ट का. इसमें लड़का जैसे-जैसे डिओ का ढक्कन खोलता है, लड़की उसी अन्दाज में अपने कपड़े खोलती है. दूसरे में रेल के डिब्बे में लड़की लड़के के साथ होती है और फिर डिब्बे का दरवाजा बन्द होता है और फिर कूपे की तमाम लाइट्स. डियो के एक अन्य विज्ञापन में लड़की छुपे हुये बच्चों को ढ़ूंढ़ती है और बाद में युवक के पास पहुंच जाती है. एक कन्डोम के विज्ञापन में महिला अत्यधिक कम कपड़ों में दिखाई देती है और कहती है कि स्ट्राबेरी दीवाना बना सकती है. विज्ञापन है बैग का. लड़की लड़के के साथ लिफ्ट में है और किस करना चाहती है. सामने दिखाई देता है सीसीटीवी, लड़की अपनी पीठ का बैग कैमरे पर उछाल देती है और फिर. इसी प्रकार एक विज्ञापन आता है एक औषधि का. इस विज्ञापन में पुरुष महिला के अंतर्वस्त्र का हुक खोलने की नाकामयाब कोशिश करता हुआ दिखाया जाता है. एक विज्ञापन आता है एक तेल का, जिसकी पंच लाइन है "रात भर चले". मजे की बात यह है कि इस तरह के अश्लील विज्ञापन न्यूज चैनलों पर आते हैं और खूब आते हैं. वे चैनल जो हर रोज दिन में पचास दफा नैतिकता, ईमानदारी के पाठ पढ़ाते हैं, जब खुद की बारी आती है तो इन विज्ञापनों से मिलने वाले धन के आगे इस सब की गठरी बनाकर ताख/ताक/आले पर रख देते हैं.यदि यह कहा जाये कि भारत में लोग सेक्स को टैबू मानते हैं तथा यौन शिक्षा नहीं दी जाती जिससे यौन-अपराध बढ़ रहे हैं तो यह स्वीकरणीय नहीं है, क्योंकि जिन देशों में यौन शिक्षा दी जाती है तथा यौन सम्बन्धों में खुलापन है, वहां भी यौन अपराध न तो खत्म ही हो सके और न ही उनमें उल्लेखनीय कमी आई. यदि खुलेपन की बात की जाये तो बेटी की शादी करने वाला पिता जानता है कि शादी के बाद किस तरह के सम्बन्ध बनते हैं, लेकिन आज तक किसी बाप को बेटी से यह पूछते हुये सुना है कि शादी के बाद की रात कैसी गुजरी. तो चैनल वालों भारत को भारत ही रहने दो इसे इण्डिया मत बनाओ.

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