तानाशाह भारत में भी हैं
तानाशाहों के दो साक्षात अवतारों से परिचय कर लीजिये. पहला आदरणीय जूनियर बुखारी साहब, वही स्वर्गीय सीनियर साहब के सुपुत्र जो पुत्र होने के नाते मुस्लिमों के मसीहा बने हुये हैं. यह बुखारी साहब लखनऊ में एक पत्रकार वार्ता कर रहे थे, राम जन्मभूमि से सम्बन्धित वाद के सम्बन्ध में. इसी प्रेस कान्फ्रेंस में एक पत्रकार वहीद चिश्ती साहब ने एक सवाल पूछ लिया कि चूंकि वह भूमि अयोध्या के राजा दशरथ के नाम से कागजातों में चढ़ी हुई है, इस नाते राम जन्मभूमि के लिये भूमि सौंप कर विवाद खत्म करने में क्या परेशानी है. बस फिर क्या था शांति के प्रवर्तक धर्म इस्लाम के (भारत में) सबसे बड़े धार्मिक नेता बुखारी साहब ने पत्रकार महोदय के खिलाफ फतवा जारी कर दिया और इस फतवे पर तुरन्त अमल हुआ. वहां मौजूद शान्ति के पुजारियों ने पत्रकार चिश्ती साहब को पीटना प्रारम्भ कर दिया और फिर बुखारी साहब ने भी. और हो भी क्यों न, आखिर इसी शान्ति के पथ पर चलकर ही कश्मीर को दारूल-हरब में बदला जा सका है. जैसे तैसे पत्रकार महोदय को बचाया जा सका और खानापूरी के नाम पर बमुश्किल रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकी. इस रिपोर्ट का होगा क्या. बुखारी साहब बेरोकटोक घूम रहे हैं, पुलिस बयान दे रही है कि जांच के बाद आवश्यक कार्रवाई की जायेगी. हमारे मीडिया वाले इस दुष्कृत्य को महिमामंडित कर रहे हैं. यदि राम जन्मभूमि से सम्बन्धित किसी प्रेस कान्फ्रेंस में किसी हिन्दू नेता ने किसी पत्रकार के साथ ऐसा कर दिया होता तो यही चैनल और मीडिया वाले "भगवा आतंकियों की दादागीरी" जैसे जुमले उछाल रहे होते और वामपंथी, कांग्रेसी नेताओं के साथ तमाम धर्मनिरपेक्ष (क्या वाकई में?) समाजसेवियों के साथ दिन रात लगातार डिस्कशन चलता और वह नेता जेल की सलाखों के पीछे होता. लेकिन यही फर्क होता है वोट बैंक होने और न होने के बीच का.
दूसरा प्रकरण कानपुर का है, जहां पुलिस के तानाशाही रवैये का शिकार इस बार एक दैनिक पत्र को होना पड़ा है. एक बालिका के साथ बलात्कार के मामले में अखबार की रिपोर्टिंग के चलते पुलिस को स्कूल प्रबन्धक के पुत्र को गिरफ्तार करना पड़ा. जाहिर है कि इस तरह के मामले से शासन कि बदनामी तो होती ही है और बदनामी से बचने का अच्छा तरीका यही है कि अपराध होता है तो होने दो लेकिन रिपोर्ट दर्ज मत करो. हर कोई अपने नम्बर बढ़वाना चाहता है, लिहाजा कानपुर की पुलिस क्यों पीछे रह जाती. सबक सिखाने के लिये यह प्रचारित करके कि चोरी के वाहनों की तलाश की जा रही है, पत्र के कार्यालय को घेर कर नजरबन्दी जैसी स्थिति बना दी गयी. इस संस्करण का सर्कुलेशन भी लाखों में है. और एक दिन अखबार न छपने का मतलब करोड़ों का नुकसान. अभी तक तो यह होता आया था कि कभी कभी पत्रकारों की पिटाई हो जाती थी या कभी कभी इक्का दुक्का पत्रकार पर पुलिस अपना शिकंजा करने का प्रयास करती थी, लेकिन यह तो बिल्कुल आपातकाल जैसी स्थिति बना दी गई.
कौन कहता है कि तानाशाह खत्म हो गये. भारत में तो हर जिले, हर शहर, हर मोहल्ले में मिल जायेंगे. ऊपर वाले दोनों दृष्टान्त बताते हैं कि भैंस तो उसी के साथ जायेगी जो सामने वाले का सर लाठी से फोड़ देगा.
Comments
Post a Comment