बहुत सस्ते हो गये हैं फ्लैट...
जल्दी से खरीद लीजिये, बहुत सस्ते हो गये हैं फ्लैट. यह सुविधा केवल सरकारी कर्मचारियों के लिये और उनके परिवारी जनों के लिये ही है. केवल साढ़े छत्तीस लाख से प्रारम्भ. चौंक गये न.
एक नये भर्ती चपरासी की तनख्वाह लगभग बारह-तेरह हजार होती है, निम्न श्रेणी लिपिक की पन्द्रह-सोलह हजार. ग्रुप-बी अधिकारी की पैंतीस हजार और ग्रुप-ए अधिकारी की चालीस-बयालीस हजार. जो ग्रुप-ए अधिकारी आज से बीस साल पहले भर्ती हुआ होगा, उसकी तनख्वाह लगभग सत्तर हजार रुपये प्रतिमाह है. और वह भी तब जब छटे केन्द्रीय वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद वेतन संशोधित हुये. इससे पहले वेतन लगभग आधे थे.
एक चपरासी के लिये भी कम से कम दो कमरे तो चाहिये रहने के लिये. छ्त्तीस लाख रुपये का फ्लैट लेने का बूता कितने सरकारी कर्मचारियों/अधिकारियों का है. आय में बढ़ोत्तरी हुई पचास प्रतिशत तो व्यापारी अपने मुनाफे में सौ-डेढ़ सौ प्रतिशत वृद्धि की व्यवस्था पहले ही कर लेते हैं.
बात करते हैं छोटे शहरों की. जमीन कब्जा ली है पैसे वालों ने. किसी भी सड़क पर निकल जायें, आपको पता चलेगा कि यह जमीन फलां लाला ने खरीद ली है, यह फला व्यापारी ने, यह फलां डाक्साब ने. जमीन पर कोई राशनिंग नहीं है. जिनके पास पैसे की इफरात है, वे जमीन खरीद लेते हैं सस्ते दरों पर, इकट्ठी. अब जमीन बची ही नहीं क्योंकि सारी तो पहले ही पैसे वालों ने खरीद ली. रहना तो हर किसी की प्राथमिक आवश्यकता है, लिहाजा अब भूमि-धर उस सस्ती खरीदी जमीन के टुकड़े कर मन-माफिक दामों में बेचता है, जिसमें उसका मुनाफा होता है पांच सौ गुना, हजार गुना.
बड़े शहरों में आ जाइये. यहां भी जमीनों का वही हाल है. बड़ा शहर, जमीन कम. कुछ सरकारी एजेंसियां निकम्मी और भ्रष्टाचार में लिप्त निकल आईं, और इसी के आधार पर प्राइवेट बिल्डर्स को खड़े होने के लिये जमीन मिल गयी. नतीजा यह कि वे चार कदम आगे आम आदमी को लूटने में. और कौन सा आम आदमी इन बिल्डिंगों में फ्लैट खरीद पा रहा है. इसी का उदाहरण ले लें तो तीस लाख कर्जे की किस्त बनती है तीस हजार रुपये महीना. बच्चों की शिक्षा-दीक्षा, मां-बाप, पत्नी और स्वयं की हारी-बीमारी, खाना-पीना, कपड़े-लत्ते. कम से कम मध्य लेवल के अफसर तक का व्यक्ति तो फ्लैट खरीदने की क्षमता नहीं रखता.
फिर इन फ्लैटों को खरीदता कौन है? उसके स्रोत क्या हैं, कमाई के. कर्जा लिया तो उसकी भरपाई कहां से. लाला खरीदेगा तो ग्राहकों से वसूलेगा. छोटा सरकारी कर्मचारी खरीदेगा तो एक नम्बर की कमाई से तो लगभग असम्भव है. मुनाफे की कोई सीमा नहीं. कितना मुनाफा अधिकतम होना चाहिये. अनलिमिटेड. जब बीस रुपये की चीनी खुलेआम साठ रुपये पहुंचा दी जाती है तो इससे बड़ी स्वीकृति क्या हो सकती है सरकार द्वारा स्वीकृत भ्रष्टाचार की..

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