पीपली लाइव और बवाल - एक बहुत बीलेटेड समीक्षा...
फिल्में मैं कम ही देखता हूं. कल थोड़ा सा मौका मिला तो पीपली लाइव देखने का विचार बना. इसलिये और भी क्योंकि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में इसके विरुद्ध प्रदर्शन किया गया था. आमिर खान निश्चित रूप से एक बेहतर अभिनेता हैं, इसमें कोई शक है ही नहीं. अब उनके इस प्रोडक्शन के लिये भी परखना बाकी था. "मंहगाई डायन" पहले ही लोकप्रिय हो चुका था. रघुवीर यादव मंझे हुये कलाकार हैं ही. नत्था को देखने के लिये भी मन लालायित था. प्रदर्शन इस बात को लेकर हुआ था, जैसा कि पढ़ने को मिला, कि, इस फिल्म में किसानों का मजाक उड़ाया गया था और रुपये के लालच में किसानों को आत्महत्या के लिये दिखाकर उनके चरित्र को नीचा दिखाया गया था, वगैरा-वगैरा. फिल्म के प्रोमो टेलीविजन पर देखे थे और एक दो लोगों से सुना भी था. देखने पर पाया कि फिल्म बहुत अच्छी है और जिन्होंने फिल्म के विरुद्ध प्रदर्शन किया था, उनमें से शतांश लोगों ने ही यह फिल्म देखी होगी. मीडिया, अफसरशाही और राजनीतिबाजों के काकस की कहानी ठीक ठाक दर्शाई है. मीडिया द्वारा "नत्था द्वारा दीर्घ शंका करने" को ब्रेकिंग न्यूज बनाना और एक गरीब किसान-टर्न्ड-मजदूर की और उस स्थानीय पत्रकार (जिसने नत्था के बारे में मीडिया को बताया था) की मृत्यु को एक किनारे लगा देना, करारा व्यंग्य है, मीडिया की कार्यप्रणाली पर. आई०ए०एस०अफसरों की कार्यप्रणाली, तहसील स्तर के कारिन्दों की कारगुजारी और पुलिस वालों की पुलिसिया हरकतों तथा राजनीतिबाजों की कलाबाजियों का भी अच्छा चित्रण है. इस स्तर के किसानों के साथ में बहुत सारी समस्यायें हैं. उन्हें बैंकों से लोन नहीं मिल पाता. फसल के लिये भंडारण की सुविधा है नहीं. अपनी उपज को बड़ी मंडियों में लाकर बेच नहीं सकते क्योंकि उनके गांव से शहर को जोड़ने के लिये सड़क की सुविधा नहीं है और न ही उचित ट्रांसपोर्टेशन. ऊपर से कंगाली में आटा गीला होने की कहावत तब सिद्ध हो जाती है जब सरकार द्वारा दिया गया बीज बांझ निकल जाता है. बड़ी कम्पनियां मैदान में आ रही हैं जिनका बीज मंहगा है, और उस से फसल ही मिलेगी, बीज नहीं. बीटी काटन का दंश अभी तक किसान झेलते आ रहे हैं. जिस देश की पूरी अर्थव्यवस्था कृषि आधारित थी, वह खत्म होती जा रही है. विश्व-बैंक कह लीजिये, आई०एम०एफ० या कुछ और. किसान, मजदूर में तबदील होता जा रहा है. हर हाथ को काम की परिकल्पना तो तभी साकार होगी, जब बैलों को हांकने वाले हाथों में तसला-परात पहुंच जायेगा. उस दिन का इन्तजार है जब मीडिया किसी की हनीमून लाइव दिखायेगा..
Comments
Post a Comment