राजधानी से दिल्ली यात्रा

भारी भीड़ के चलते राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली जाना पड़ा. टिकट तत्काल में लेने के लिये सुबह छ: बजे पहुंचना और फिर दो घण्टे खिड़की खुलने का इन्तजार करना कितना कष्टदायक होता है, इसका अहसास हुआ. खैर टिकट मिल गया. दो सौ रुपये टिकाना तत्काल के लिये और वह भी तीन दिन पहले. खैर.
राजधानी का भी वही हाल था जो बाकी ट्रेनों का होता है. वही गन्दे टायलेट. कहीं पानी की टोंटी खराब तो कहीं टोंटी ही नहीं. नीचे गन्दा. कहने को सफाई व्यवस्था अब निजी हाथों में दे दी गयी है, लेकिन वही रवैया. और ऊपर से कमीशनखोरी तथा श्रमिकों के शोषण का रास्ता और खुल गया. मैं जब कभी लघुशंका के लिये  ट्रेन के टायलेट में जाता हूं तो साक्षात नरक के दर्शन हो जाते हैं. शायद यही कारण है कि जो लोग अधिक यात्रा करते हैं, उनमें छूने से फैलने वाली बीमारियां बाकियों की तुलना में अधिक फैलती हैं.
लंच का विकल्प था. शाकाहारी. लंच पैकेट देने वाला कर्मचारी बड़े प्रेम से बोल रहा था. मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. काल सेंटर पर बैठे हुये कर्मचारी की तरह मधुर आवाज में "जी सर, क्या दूं सर, ये सर और वो सर". इस सरसराहट का राज यात्रा खत्म होने पर पता चला, जब वे लोग अपने वसूली अभियान में लग गये. जबरदस्ती टिप लेने का मतलब वसूली ही है मेरे अनुसार. मैंने जब देने की असमर्थता दिखाने की उत्कंठा दिखाई तो बगल वाले सज्जन ने भी यूं घूरा जैसे कि मैं एक तुच्छ जीव हूं. 
कई बार रेलवे के विजीलेंस, रक्षा-सुरक्षा, शिकायत करने के लिये कुछ नम्बर फैशन के तौर पर अखबार में छपवा दिये जाते हैं, इसी प्रकार के तीन नम्बर मेरे पास सुरक्षित थे, जिन पर घण्टी जाती रही, लेकिन उठे नहीं, क्या आश्चर्य है कि प्रधान जी भी राजा वाली घण्टी नहीं सुन पाये.
दिल्ली में घुसने पर पाया कि कुछ बच्चे किनारे खड़े थे और पैन्ट्री कार वाले से खाना फेंकने की विनती कर रहे थे. किसी चट्टान के ऊपर गिरने जैसा दृश्य लगा. हमारे हुक्मरान भी राजधानी और शताब्दी से गुजरते हैं, लेकिन उनकी खिड़कियों पर पर्दे पड़े रहते हैं और शायद आंखों पर भी. फिर यह भी तो है कि वोटर तो इन्हीं को बनाना है.
दोनों तरफ घर हैं, आशियाने बने हुये हैं. टीन से- तिरपाल से-प्लास्टिक की पन्नियों से. कैसे रहते होंगे, सोचकर ही झुरझुरी आ गयी. आजाद होने के साठ साल से भी अधिक हो गये, जनता को रोटी-कपड़ा-मकान मुहैया नहीं करा सके. पीने को पानी नहीं. निवृत्त होने को जगह नहीं. तरक्की का एक चेहरा यह भी है.
आगे मेट्रो ट्रेन में बैठने का मौका मिला. क्या जबरदस्त भीड़ थी. बस खड़े हो जाइये भीड़ अपने आप मेट्रो ट्रेन के अन्दर पहुंचा देती है और राजीव चौक पर उतरने का अनुभव भी ऐसा ही रहा. व्यवस्थापक अगर कर्मठ और कुशल हो तो किसी भी मशीन/व्यवस्था को सुचारू और सुगम बना सकता है और यदि निकम्मा हो तो देश का भी भट्टा बिठा सकता है. भीड़ के बावजूद मेट्रो ट्रेन का सफर बस से कहीं अधिक बढ़िया है, क्योंकि इसमें समय की बचत है.
नारी बिच सारी है कि सारी बिच नारी है कभी पढ़ा था. दर्शन भी हो गये.  सागरपुर के सामने वाली सड़क पर घूमने निकल गये, अमूल का बड़ा सा बोर्ड लगा था. थोड़ा सा आगे बढ़कर एक सड़क दिखाई दी, जिस पर बड़ा सा फाटक लगा था. देखिये ये चित्र. इसमें एक लाल रंग का बिन्दु है जो एक मदरसे को दिखाता है. जो लाल पट्टी है यहां पर एक फाटक लगा है. फाटक सड़क पर लगा है, जो मदरसे ने लगाया है. जहां पर सड़क खत्म होती है वह भी किसी इन्स्टीट्यूट के दरवाजे पर खत्म होती है और IITM का पिछला दरवाजा भी यहीं पर खुलता है. अब पता नहीं कि इन इन्स्टीट्यूट वालों ने सड़क बनवा कर दरवाजे गलत ढ़ंग से लगा लिये या कि फिर मदरसे ने सड़क पर गलत ढ़ंग से फाटक लगाया है.
आनन्द विहार रेलवे स्टेशन पर एक अच्छी चीज  दिखाई दी और वह थी चित्रों में व्यक्त रेलवे की धरोहर.  कम से कम बीस चित्र थे, जिनमें कई स्टेशनों के कई वर्ष पहले के चित्र. इन्जनों और गाड़ियों के चित्र. रेलवे लाइन और पुल बनाने के चित्र, बनाने वाले इन्जीनियरों और कामगारों के चित्र तथा महात्मा गांधी के चित्र भी थे. देखकर बहुत अच्छा लगा. हमारे लिये हमारे पूर्वजों ने कितना त्याग किया और बदले में हमने उन्हें क्या दिया. वापसी में गरीब रथ पर सवार हुये. चली समय पर, लेकिन रास्ते में न जाने क्या हुआ कि चली-रुकी, रुकी-चली और पांच सौ किमी में सवा घण्टा लेट. मन में कई गाने खुद ब खुद गूंजने लगे, रेलिया बैरन पिया को लिये जाये रे. रेलगाड़ी-रेलगाड़ी, गाड़ी बुला रही है.

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