एक मर जाये तो खबर, अठारह को मार दिया जाये तो कोई सुगबुगाहट तक नहीं...

एक आदमी मर जाये तो खबर बन जाती है और अठारह लोगों की हत्या आतंकवादी कर दें तो सुगबुगाहट तक नहीं होती. आसाम में आतंकवादियों ने अठारह हिन्दीभाषियों की गोलियों से भून कर हत्या कर दी, किसी खबरिया चैनल और अखबार के पास इतना समय और इतनी जगह नहीं कि प्राइम टाइम और फ्रन्टपेज पर इस नरसंहार को लगा पाते. सब को पता है कि एनडीबीएफ आतंकवादियों को पैसा और हथियार कौन लोग मुहैया करा रहे हैं. बांग्लादेश से आये अवैध घुसपैठिये जिन्हें हमारे यहां के  राजनीतिबाज अपने देश का सम्माननीय नागरिक बनवा चुके हैं, इन तमाम आतंकवादी संगठनों में शामिल हैं. इनकी फंडिंग और आर्म्स सप्लाई के पीछे कुछ पड़ोसियों की एजेंसियां शामिल हैं, और इन एजेंसियों की इच्छापूर्ति के लिये हमारे यहां व्याप्त भ्रष्टाचार खाद का काम कर रहा है. पिछली बार नरसंहार पर लिखी गयी पोस्ट के ऊपर एक टिप्पणी मिली थी कि उत्तर-पूर्व दूर है, संभवत: इसलिये ऐसी खबरों को प्रमुखता से नहीं दिखाया जाता.
मैं यह कहना चाहता हूं कि जो लोग इस आतंकवादी हमले में मारे गये उनके परिवारों के लिये तो वह उतने ही महत्वपूर्ण थे जितने कि भारत के किसी भी अन्य परिवार के लिये उनके लोग.  मीडिया की यह चुप्पी घातक है और अक्षम्य है. क्या उत्तर-पूर्व में रहने वाले किसी व्यक्ति की जान दिल्ली या मुम्बई में रहने वाले किसी राजनीतिबाज या उद्योगपति की जान से कम महत्वपूर्ण है. क्या इन अठारह लोगों की जानों का मोल सोहराबुद्दीन जैसे दुर्दांत अपराधी की जान के बराबर भी नहीं. या फिर मीडिया की नजर में उत्तर-पूर्व देश का हिस्सा नहीं है? पाकिस्तान में होने वाली आतंकी वारदातों को लाइव दिखाने वाले खबरिया चैनल देश में हुये इस भयानक नरसंहार पर एक लाइन का स्क्रोलर तक नहीं दिखा रहे, कुछ मिनटों की स्टोरी करने की बात तो बहुत दूर है. नाग-नागिन, भूत-प्रेत, अंधविश्वास बेचने के लिये इनके पास समय की इफरात है लेकिन असम में घटित भीषण आतंकवादी घटना में मारे गये अठारह लोगों की कवरेज के लिये इनके पास समय नहीं. इस समय किसी राजनीतिबाज के पास भी समय नहीं. एक ऐसे आतंकी को, जो कि अल्पसंख्यक वर्ग से सम्बन्धित है,  मुठभेड़ में ढ़ेर हो जाता है तो तमाम राजनीतिक दल जांच दल भेजते हैं, संसद से सड़कों तक हंगामा कर देते हैं. बयानवीर बयान दागते रहते हैं, अधिक पीछे जाने की जरूरत नहीं, बाठला हाउस एनकाउन्टर को याद कीजिये. लेकिन अठारह हिन्दीभाषियों को कत्ल कर दिया जाता है तो एक शब्द इनके मुंह से नहीं फूटता. यहां मैं यह जरूर लिखना चाहता हूं कि मुझे नहीं पता इनमें किस जाति-धर्म के लोग थे, लेकिन यह भारतीय थे, अपने घरों के प्रिय थे और इन्हें सिर्फ इसलिये मार डाला गया कि ये भारतीय थे, हिन्दीभाषी थे.  मुझे तो इस रहस्यमयी चुप्पी के पीछे भी दाल में काला लगता है. सच्चे भारतीयों, तुम्हारे भाग्य में यूं ही मरना बदा है.

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