भ्रष्टाचार का इलाज
किसी ने कहानी सुनाई थी. सच्ची या झूठी, पता नहीं. बताया कि एक यूरोपियन देश में ट्रेन चलना प्रारम्भ हुई. लोगों ने यात्रा करना प्रारम्भ किया. हमारे यहां की ही तरह वहां भी बिन टिकट चलने वालों की कमी न थी. नतीजा हुआ रेल को नुकसान. मन्त्रियों में चर्चा हुई. एक ने सुझाव दिया कि दस लोगों को फांसी देना पड़ेगी और बेटिकट चलना खत्म हो जायेगा. सुझाव नहीं माना गया. लोग बेटिकट चलते रहे, पकड़े जाते रहे, जुर्माना देते रहे, छूटते रहे. समय बीता, घाटा बढ़ता रहा. अन्त में दस लोगों को फांसी का सुझाव माना गया. उस मन्त्री ने सघन जांच कराई और एक माह में जो व्यक्ति सबसे अधिक बार बेटिकट पकड़ा गया, उसे फांसी देने की घोषणा हर जगह कराई गई. पूरे एक माह तक. अन्त में उसे एक सार्वजनिक स्थान पर फांसी दे दी गयी. इसी प्रकार यह कार्यक्रम दस माह तक चालू रहा. अन्तिम परिणाम रहा कि लोग टिकट लेकर चलने लगे.
कई जगह पढ़ा है कि भ्रष्टाचारियों को फांसी होना चाहिये. अच्छी बात है. लेकिन इसके लिये खुफिया तन्त्र, न्यायतन्त्र मजबूत हो, तवरित हो, अच्छा हो, सच्चा हो. लेकिन जो भ्रष्टाचार कृत्रिम मंहगाई के रूप में है, उस पर कैसे काबू आयेगा. समाज/मार्क्स/पूंजी वादों की अपनी अपनी अच्छाइयां-बुराइयां हैं. ताना/राज शाही कोई स्वागत करने योग्य व्यवस्था नहीं है. तन्त्र वही होता है, लेकिन मालिक के इशारे भर से उसकी चाल बदल जाती है. पुलिस वालों की लाठियां कभी रुकती नहीं, बस पीठें बदल जाती हैं. लोग कहते हैं संविधान फेल हो गया, साठ साल में सैकड़ों संशोधन करना पड़ गये. मैं कहता हूं संविधान फेल नहीं हुआ, फेल हुई उन लोगों की नीयत जिनके हाथों में संविधान दिया गया था. जिस तरह के लोग राजनीति और सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं, उनके रहते भ्रष्टाचार पर काबू पाना सम्भव है ही नहीं. अब इलाज क्या है? कुछ नहीं. क्यों? अपना सुख त्यागे कौन. हराम की मिले तो छोड़े कौन. किसे मलाई नहीं चाटनी भ्रष्टाचार की. जिस लड़के को कुर्सी पाने से पहले हर चौराहे पर होती खुलेआम वसूली दिखाई देती है, कुर्सी पाने के बाद उसकी आंखों पर हरे नोटों की पट्टी बंध जाती है. जो थोड़े से ईमानदार ऐसे तन्त्र में भी बच जाते हैं, उन्हें उनके करप्ट अधिकारी तोड़ देते हैं. या तो उस निजाम का हिस्सा बनो और अपना हिस्सा निकाल लो या फिर न लो अपना हिस्सा, पूरा लेने को वह तैयार बैठा है, लेकिन गलत काम तो करवायेगा ही. और उस बचे खुचे ईमानदार को करना पड़ता है. आप कहेंगे कि वह मना कर सकता है, बेशक, लेकिन ऐसे में उसे नौकरी करना दूभर हो जायेगा. ऊपर बैठे हुये भ्रष्ट भेड़िये सब एक हो जाते हैं और उस शख्स को जीना तक मुहाल कर देते हैं. कारण क्या है? भ्रष्टों की मशीनरी का हर पुर्जा बड़ी ईमानदारी से चलता है. भ्रष्ट एक दूसरे को बचाने के लिये एक हो जाते हैं, अपने गलत काम को भी सही करा लेते हैं, लेकिन ईमानदार एक नहीं होते. उनकी मशीनरी भी उतनी कामयाबी से नहीं चलती. वे अपने सही काम को भी नहीं करा पाते. और सबसे बड़ी बात यह है कि अब यह अनुपात शायद हजार के मुकाबले एक ही रह गया है. अंधेरा ही है चारों तरफ. प्रकाश की संभावनायें धूमिल हैं.
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