प्रणब मुखर्जी की बात को मानना चाहिये.

प्रणव मुखर्जी कह रहे हैं कि अभी तक चार जेपीसी बैठी हैं. बोफोर्स काण्ड, हर्षद मेहता, स्टाक मार्केट तथा साफ्ट ड्रिंक में पेस्टीसाइड्स के मामले में और इस सबके बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ. सही कह रहे हैं मुखर्जी साहब. ऐसी समितियों से कुछ भी हासिल नहीं होता सिवा जनता की गाढ़ी कमाई की बर्बादी के. जब एक सदन प्रस्ताव पारित करता है और दूसरा उससे सहमत हो जाता है तब जेपीसी बनाई जाती है. अब जेपीसी के पास अधिकार तो बहुत सारे होते हैं, वह किसी को भी बुला सकती है, किसी से भी गवाही ले सकती है. किसी भी कागज को देख सकती है, लेकिन ऐसे कागज को नहीं जिसे सरकार राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़ा हुआ मानती हो. और इसका सारा कामकाज गोपनीय होता है. पीएसी के अधिकार क्षेत्र में मात्र इतना होता है कि वह सरकार की नीतियों की समीक्षा कर सकती है. निस्संदेह जेपीसी के अधिकार पीएसी से कहीं अधिक होते हैं, लेकिन डर्टी पार्टी-वोट पालिटिक्स के चलते जेपीसी भी कुछ नहीं कर पाती. मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूं कि गोपनीयता का आवरण काले धन्धों को छुपाने के लिये अधिक प्रयोग किया जाता है. विदेशों में इस प्रकार की समितियों का गठन जब भी किया जाता है, उनका सारा कामकाज पारदर्शी होता है और जनसाधारण के लिये उपलब्ध. (यह बात अलग है कि यहां जनता को मालिक बताया जाता है और मालिक से सबकुछ छुपाया जाता है). और जब प्रणब मुखर्जी यह मान रहे हैं कि यह पालिसी एनडीए की बनाई हुई थी जिसे राजा ने प्रभावी किया तो सारा मामला ही खत्म हो जाता है. प्रणब तो तीन एजेंसियों की बात कर रहे हैं, पीएसी, कैग और सीबीआई. मैं तो कहता हूं कि इन पर भी धन और समय का अपव्यय करने से कुछ हासिल नहीं होगा. ग्रेट इन्डियन तमाशे की एक और कड़ी के शानदार समापन की तैयारी ही है यह सब.

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