अन्ना हजारे के अनशन के तारतम्य में.
अन्ना हजारे के अनशन के बाद बहुत सारी क्रियायें, प्रतिक्रियायें, तर्क, वितर्क और कुतर्क सामने आये. बहुत से लोगों ने कई शंकायें और आशंकाये भी जताईं. विशेषत: राजनीतिबाज, जिन्हें इस अनशन के दौरान रोष का सामना करना पड़ा, वे कहीं सामने से तो कहीं पीछे से वार करते रहे. कुछ स्वयंभू पत्रकारों ने भी अन्ना हजारे
के इस कार्य पर प्रश्नचिन्ह लगाने की कोशिश की तो सामाजिक समानता के लिये कार्य करने का दावा करने वालों ने भी इस प्रयास को एक विशेष वर्ग से जोड़कर इसे पेश करना चाहा. अब तो कई नेता यह भी कह चुके हैं कि गांधी जी भी यदि आज के हालातों में होते तो भ्रष्टों के रंग में ही रंग चुके होते. किसी ने उनके जन-लोकपाल विधेयक को हिटलर की तरह का बता दिया तो किसी ने अन्य चश्मे से देखा. खैर, मेरा अपना मानना यह है -
के इस कार्य पर प्रश्नचिन्ह लगाने की कोशिश की तो सामाजिक समानता के लिये कार्य करने का दावा करने वालों ने भी इस प्रयास को एक विशेष वर्ग से जोड़कर इसे पेश करना चाहा. अब तो कई नेता यह भी कह चुके हैं कि गांधी जी भी यदि आज के हालातों में होते तो भ्रष्टों के रंग में ही रंग चुके होते. किसी ने उनके जन-लोकपाल विधेयक को हिटलर की तरह का बता दिया तो किसी ने अन्य चश्मे से देखा. खैर, मेरा अपना मानना यह है -
१-"अन्ना के प्रयासों से कुछ नहीं होने वाला, भ्रष्टाचार देश में पूरी तरह से व्याप्त हो चुका है."
"यदि हमारा प्रियजन किसी गम्भीर बीमारी से ग्रसित हो जाता है तो हम उसे नीरोग करने के लिये इलाज कराते हैं न कि उसे यह कहकर मरने के लिये छोड़ देते हैं कि बीमारी पूरे शरीर में फैल गई है."
२-"अन्ना का तरीका ठीक नहीं है, यह ब्लैकमेलिंग है."
"इसका उत्तर अन्ना स्वयं दे चुके हैं, लेकिन फिर भी यदि अनशन करना ब्लैकमेलिंग है तो अन्ना को क्या संसद के ऊपर धावा बोल देना चाहिये था. अनशन का गांधीवादी तरीका अधिक अच्छा है या तालिबानी या फिर माओवादियों का. याद रखें कि क्रान्तिकारियों के सतत संघर्ष के साथ अहिंसात्मक आन्दोलन के माध्यम से ही स्वतन्त्रता मिल सकी. यदि अनशन के अलावा कोई और अच्छा रास्ता है तो वह रास्ता यह सुझाव देने वालों को अपनाना चाहिये."
३-"इतने वर्षों में भ्रष्टाचार नहीं मिटा तो अब क्या मिट पायेगा."
"सैकड़ों वर्ष की गुलामी इस देश ने झेली, यदि हमारे अमर शहीदों ने यही सोच लिया होता कि ’इतने वर्षों में आजाद नहीं हो सके तो आगे क्या होंगे’ तो हम अभी भी गुलामी की जंजीरों में जकड़े होते."
४-"एक और कानून की आवश्यकता है ही नहीं."
"समय के साथ बदलाव आवश्यक है, परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है. पहले अपराधों का रूप इतना जटिल नहीं था तो एक सामान्य कानून से काम चल जाता था, जब अपराधों की प्रकृति और प्रवृत्ति बदली तो कानून भी बदले गये. यदि बदलाव आवश्यक न होता तो संविधान में संशोधनों का शतक क्यों बनता."
५-"पहले हम सुधरें, फिर दूसरे को सुधारने की बात करें, यदि हम रिश्वत देना बन्द कर देंगे तो लोग लेंगे कहां से"
"यदि इस प्रक्रिया को पूरे देश में लागू किया जाये तो हमें पुलिस और न्यायालयों को भी बन्द कर देना चाहिये, क्योंकि लोग चोरी-हत्या-अपहरण-लूट और अन्य दुष्कर्म करना छोड़ देंगे तो न तो हमें पुलिस की आवश्यकता
होगी और न ही न्यायालयों की. और फिर इसी तरह हमें पूरे सरकारी तन्त्र की आवश्यकता भी नहीं होगी, जिसमें हमारे माननीय भी आते हैं. दर-असल भ्रष्टाचार की नदी ऊपर से नीचे की ओर बहती है, यदि शीर्ष पर ईमानदार लोग बैठे होंगे तो नीचे अपने आप ईमानदारी आ जायेगी. दूर मत जाइये, दुपहिये का लाइसेंस बनवाकर देख लीजिये, स्वयं मालूम चल जायेगा कि लोग पैसा खुशी से देते हैं या उन्हें पैसा देने पर मजबूर किया जाता है. जहां पोस्ट-मार्टम के लिये भी पैसे देने पड़ते हों, जेब कटाने के बाद रिपोर्ट लिखवाने के लिये दोबारा मुंडना पड़ता हो, वहां यह तर्क शायद ही किसी के गले उतरे."
६-"अन्ना का जन-लोकपाल एक सुपरकाप है, उसमें हिटलर की आत्मा आ गयी तो."
"साधारण काप्स तो अभी तक हमने देखे ही हैं, उनसे तो बहुत अधिक कामयाबी नहीं मिली, तो अब एक सुपरकाप को भी देख लिया जाये, उसमें हर्ज कैसा. रही बात हिटलर की आत्मा आने की, तो ऐसे भी साधारण लोग देखे हैं जो वर्दी पहनने के बाद हिटलर के भी बाप बन जाते हैं. जाने कितने निर्दोष लोग पुलिस की गोलियों के शिकार बन जाते हैं, ऐसे हत्यारों में से हिटलर की आत्मा निकालने के लिये अभी तक इन लोगों ने क्या किया है. देश में भ्रष्टाचार अब ऐसी स्थिति में पहुंच गया है कि अब त्वरित निर्णय लेना ही देश को उबार सकता है. वह स्थिति अधिक अच्छी होगी कि आरोपी को साल भर में सजा हो जाये या निर्दोष साल भर में छूट जाये या फिर मामले बरसों-बरस खिंचते रहें. आम आदमी को निस्संदेह त्वरित निर्णय ही भायेंगे."
७-"सांसद ही बिल बना सकते हैं, वे चुने हुये प्रतिनिधि हैं, उनके लिये संविधान में व्यवस्था दी गयी है. सुझाव देने वाले और बिल बनाने वाले आप कौन-खामखाह."
" पहली बात एन-ए-सी की व्यवस्था भी संविधान में नहीं है, किन्तु एन-ए-सी देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी राय देती है, सरकार को. दूसरी-शायद इन लोगों को जानकारी न हो, संसद भी जनता की राय लेती है. पिछले दिनों मेडिकल शिक्षा से संबंधित एक बिल के बारे में रायशुमारी की गयी थी. तीसरी यह कि जो लोग चुने जाते हैं वे भी सौ प्रतिशत का प्रतिनिधित्व नहीं करते, लेकिन ऐसा माना जाता है कि वे करते हैं. सौ तो छोड़िये वे बीस प्रतिशत वोट पाकर सीट पा जाते हैं फिर ऐसे बीस प्रतिशत वाले अगर आधे से अधिक हों तो बिल पास हो जाता है, इसलिये सीधे ही जनता की राय लिया जाना बहुत अच्छा विकल्प होगा, लेकिन नेता इसे कभी नहीं अपनाना चाहेंगे."
८-"जिन्हें जनता ने चुन कर भेजा है, उन पर आक्षेप क्यों."
"टिकट जनता नहीं बांटती, राजनीतिक दलों के मुखिया बांटते हैं. जब अपराधियों को टिकट दिया जाता है तो उसके सामने भी वैसा ही व्यक्ति उतारा जाता है और जब अपराधी खड़े होंगे तो जीतेंगे भी अपराधी ही, ऐसे में जनता बेचारी क्या करे. क्या चुनाव जीतने से अपराधी की सजा माफ हो जाती है? ये अलग बात है कि चुनाव जीतने के बाद अपराधी सत्ता और धनबल का प्रयोग कर अपने खिलाफ चल रहे मामलों को खत्म कराने में कामयाब हो जाते हैं. यदि वास्तविक प्रतिनिधित्व चाहिये तो मतदान अनिवार्य क्यों नहीं किया जाता, क्यों नहीं पहली-दूसरी-प्राथमिकता रखी जाती है मतदान में. "किसी को वोट नहीं" विकल्प मशीन के अन्दर रखा जाता, क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था बनाई जाती जिसमें महत्वपूर्ण मुद्दों पर सीधे ही जनमत संग्रह कराया जा सके."
८-"एलीट ग्रुप का प्रतिनिधित्व, दलित वर्ग के लोगों से कोई लेना देना नहीं."
"फिर यह भी कहा जा सकता है कि अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व नहीं, भाषाई आधार पर नहीं, इस आधार पर नहीं, उस पर नहीं. जो यह आक्षेप लगा रहे हैं, वे स्वयं ही आगे आकर बतायें कि क्या तरीका होना चाहिये था और अब तक वे लोग चुप-चाप क्यों बैठे थे, क्यों उन्होंने इस अनशन को आगे आकर प्रारम्भ नहीं किया. किसी ने रोका था किसी भी वर्ग-धर्म-जाति को भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने को. भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-लोकपाल बिल लाने के मामले में यह सब कहां से आ गया, समझ में नहीं आता. यदि उन लोगों ने कभी इस तरह की आवाज उठाई होती और अन्ना ने आकर श्रेय ले लिया होता तो ये ठीक भी होता लेकिन स्वयं तो कुछ करना नहीं और दूसरा करे तो उसमें पचास कमियां खोजना ही ध्येय बना कर यह सब किया जा रहा है."
९-"यूपीए ने समिति का गठन कर आन्दोलन को बिठा दिया है"
"इस समिति का गठन कर निश्चित रूप से एक अच्छे काम का प्रारम्भ हुआ है. हर अच्छे काम में बाधायें तो आती ही हैं, इन बाधाओं से उबर कर लक्ष्य तक पहुंचना ही तो मानव की विजय है. कम से कोई पहल तो हुई, चुपचाप बैठने से तो फिर भी लाख गुना बेहतर है."
१०-"एक विशेष ग्रुप, जोकि सामाजिक संसाधनों पर काबिज है, उसने इसे चलाया और इसलिये चलाया कि अन्य समस्याओं से जनता का ध्यान बंट जाये."
"किसी न किसी को तो आगे आना ही था, यदि आप आते तो आपके साथ भी यही सवाल जुड़ते. अच्छी बात यह है कि आमजन की समस्याओं से सभी लोग जुड़ रहे हैं. यदि उनके पास इतने संसाधन न होते या जुटाने की क्षमता न होती तो इतने कम समय में इतने बड़े स्तर पर लोगों को जोड़ना सम्भव था ही नहीं."
११-"और भी तमाम मुद्दे हैं भ्रष्टाचार के अलावा-भूख, गरीबी, बेरोजगारी. क्या ये समस्यायें इस बिल के आने से दूर हो जायेंगी."
"बेशक हैं, लेकिन पिछले चौंसठ सालों में यह बिल बनाने के लिये अन्ना हजारे अनशन पर नहीं थे फिर भी यह समस्यायें बनी रहीं. क्या ये समस्यायें इस बिल के न आने से दूर हो जायेंगी. वस्तुत: भ्रष्टाचार ही हमारी निन्यानवे प्रतिशत समस्याओं की जड़ है. भूख, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का न होना, न्याय का न मिलना, साम्प्रदायिकता, मंहगाई सब की जड़ एक ही है भ्रष्टाचार. कालाबाजारी, सट्टेबाजों पर कार्रवाई क्यों नहीं-जड़ में भ्रष्टाचार. गगनदीप के हत्यारे लचर पैरवी के चलते छूटे-जड़ में भ्रष्टाचार-लोग तो ये तक दावा करते हैं कि वे गोली बदलवा दें, हथियार बदलवा दें. बढती साम्प्रदायिक हिंसा-गुनहगारों को राजनीतिक समीकरणों के चलते बुक नहीं किया जाता, मुकदमे तक एक्सपंज कर दिये जाते हैं-जड़ में भ्रष्टाचार. अस्पतालों में इलाज नहीं मिलता-जड़ में भ्रष्टाचार. एक रुपये की चीज बीस रुपये में-जड़ में भ्रष्टाचार."
बातें तमाम हैं, लेकिन बस इतना ही और कहना चाहूंगा कि फरवरी, २०११ में हुई भ्रष्टाचार विरोधी रैली का मीडिया ने एक तरह से बायकाट ही कर दिया, यदि उसे भी अन्ना हजारे साहब के अनशन की तरह ही कवरेज दी गयी होती तो देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध और अधिक जन-जागरण हुआ होता. कारण तो मीडिया ही बेहतर जानती है कि विश्वबन्धु गुप्ता के इतने बड़े खुलासे के बावजूद भी मीडिया के दिग्गजों की हिम्मत नहीं हुई उजागर हुये उन नामों से सवाल पूछने की. लेकिन अन्ना हजारे जी के इस अनशन को कवरेज देकर अच्छा कार्य किया है.
एक नेताजी कह रहे हैं कि गांधी जी होते तो वे भी भ्रष्ट हो जाते, एक कह रहे हैं कि इस बिल से कुछ हासिल नहीं होगा. दर-असल ये लोग एक आदमी की ताकत से घबरा रहे हैं. शेषन ने अकेले ही नेताओं को चुनावों की शुचिता और चुनाव आयोग की ताकत समझा दी. एक अकेले कलाम साहब ने अपने पद की ताकत का सही प्रयोग किया और अपने पद की प्रतिष्ठा को नयीं ऊंचाई दी. एक अकेले अब्दुल हमीद ने पैटन टैंको को रिकायललेस गन के सहारे धूल चटा दी. एक अकेले गांधी ने पूरे विश्व को अहिंसा की ताकत दिखा दी. एक अकेले सुभाष ने अंग्रेजों को दहलाकर रख दिया. एक अकेले ऊधमसिंह ने डायर को उसके अंजाम तक पहुंचा दिया. एक अकेला कोलम्बस था जिसने एक दुनिया को दूसरी दुनिया से जोड़ दिया. एक अकेले दयानन्द सरस्वती ने देश के लोगों को जगा दिया. एक अकेले रामदेव ने दुनिया में योग का डंका बजा दिया. और तो और एक अकेले विश्वबन्धु गुप्ता ने वह हिम्मत दिखाई जो कोई नहीं दिखा पाया, स्विस बैंक एकाउन्ट होल्डरों के नाम खोलकर.एक अकेले संदीप उन्नीकृष्नन के बाप की हिम्मत देखिये. एक अकेले शिवाजी की हिम्मत देखिये. एक अकेले डा०भीमराव अम्बेडकर के प्रयासो को देखिये. देखिये एक गुरु गोविन्द सिंह को जिन्होंने सवा लाख के आगे एक को खड़ा कर दिया. देखते हैं कि एक अकेले आम आदमी की जीत कब होती है.
चलते-चलते - डा०भीमराव अम्बेड़कर साहब, जिनका कि आज जन्म दिन भी है, को शत-शत नमन, के प्रशंसक होने का दावा करने वाले कुछ लोगों ने अनुपम खेर के घर पर पथराव किया. अनुपम के इस बयान के विरोध में कि उन्होंने संविधान में बदलाव की बात की थी. डा०अम्बेड़कर यदि जीवित होते, तो इस घटना से बहुत आहत होते. और यदि बात संविधान में संशोधनों की जाये तो संशोधनों का शतक लग चुका है...
चलते-चलते - डा०भीमराव अम्बेड़कर साहब, जिनका कि आज जन्म दिन भी है, को शत-शत नमन, के प्रशंसक होने का दावा करने वाले कुछ लोगों ने अनुपम खेर के घर पर पथराव किया. अनुपम के इस बयान के विरोध में कि उन्होंने संविधान में बदलाव की बात की थी. डा०अम्बेड़कर यदि जीवित होते, तो इस घटना से बहुत आहत होते. और यदि बात संविधान में संशोधनों की जाये तो संशोधनों का शतक लग चुका है...
आभासी क्रांति का स्पर्श-सुख. चौराहों की सभी लाल बत्तियों को निर्बाध पार करती, संविधान निर्माता के जयकारे लगाती रैली का जिक्र कल हमारे एक परिचित कर रहे थे.
ReplyDeleteइस विषय पर अब तक मेरी पढी हुई सर्वश्रेष्ठ पोस्ट। सचमुच बहुत ध्यान और विस्तार से अंजान/बेईमान कुतर्कों को काटा है आपने। आभार!
ReplyDeleteजो पंथ के पहले थकें,
ReplyDeleteउनको वहीं पर छोड़ दें।
Wonderful analysis !
ReplyDeleteव्यक्ति या मुद्दा कोई भी हो,सिर्फ momentum बना रहे,तो सफलता निश्चित है।
ReplyDeleteबहुत अच्छा विस्शलेशण किया है। शुभकामनायें।
ReplyDeleteबहुत अच्छा विश्लेषण..अम्बेडकर साहब को श्रद्धांजलि....
ReplyDeleteआपने विचारणीय बिन्दु प्रस्तुत किये हैं!
ReplyDeleteबहुत सशक्त आलेख!
किनारे पर खड़े हो यह फिनॉमिना निहार रहा हूं मैं। सन सतहत्तर के सत्तापरिवर्तन की निरर्थकता देख चुका हूं; सो फूंक फूंक कर आजमाऊंगा।
ReplyDeleteबढ़िया विश्लेषण ....सटीक और सशक्त चिंतन ...... आपसे सहमत
ReplyDeleteबहुत अच्छा विश्लेषण
ReplyDeleteकई दिनों व्यस्त होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका
ReplyDeletekal 14 april ko times of india men arvind kejriwal ne bhi in prashnon ke jawab kuchh isi prakar diye hain.apne shankaon ka jawab achhi tarah diya, ise aap face book par bhi dal den.
ReplyDeleteअच्छा पोस्टमार्टम किया है आपने। वैसे पी सी गोदियाल जी ने जिस अंग्रेजी टिप्पणी को पेस्ट किया है, उससे काफी हद तक सहमत हूँ। उदाहरणार्थ, टी एन शेषन जैसा ईमानदार व्यक्ति जब राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए खड़ा हुआ, तो उसकी जमानत जब्त हो गई। हम चाहते हैं कि ईमानदार व्यक्ति ईमानदारी से कार्य करता रहे और इसी प्रकार शहीद हो जाये। शहादत के बाद हम उसका एक मकबरा बना देते हैं। लेकिन जब भी कोई ईमानदार व्यक्ति सिस्टम को सुधारने के लिए सिस्टम में घुसने का प्रयास करता है, तो हमारी तुरन्त प्रतिक्रिया होती है, ''लगता है इसको भी खाना-कमाना है, सारी ईमानदारी धरी रह गई जनाब की।''
ReplyDeleteप्रिय भाई,
ReplyDelete‘दुआओं का असर’ अवश्य होगा, बस मन में आस्था और विश्वास पैदा कीजिए...तथास्तु!
बहुत ही सकारात्मकता के साथ लिखा है यह आलेख. वाकई सरकार जनकल्याण के लिए जितनी योजनाएं चलती हैं, यदि उनके फायदे पूरी तरह जनता तक पहुंचे होते तो अब तक देश की कायापलट हो गयी होती. पर होता यह है कि विकास योजनाओं का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेट चढ़ जाता है. देश आत्मा को गौरवान्वित करने के लिए नेता-प्रशासकों तथा आम जनजीवन से भ्रष्टाचार को दूर करना के लिए हर संभव कदम अब उठाने ही होंगे.
ReplyDeleteमैं कह नहीं सकता कि इस विधेयक का कितना प्रभाव पड़ेगा और कौन से व्यक्ति किस मंशा से इस कार्यक्रम की फंडिंग कर रहे थे या क्यों कर रहे थे, लेकिन इस विधेयक के प्रावधान तो काफी सार्थक लग रहे हैं. रामदेव जी के सुझाये हुये उपाय भी बहुत अच्छे हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि जिनके ऊपर दायित्व है वही लिप्त हैं. इसलिये इस विधेयक के साथ सिस्टम को बदलना अत्यावश्यक है. लेकिन बदलाव लाये कौन? मतदाता, जो जानकार और जागरुक हैं वे औरों को जगाना नहीं चाहते और जो वोट डालते हैं उन्हें बरगलाने के लिये बहुतेरे सामने खड़े हैं. जब लैपटाप और मंगलसूत्र बांटे जा रहे हों तो ईमानदारी की बात छलावा नहीं लगती.
ReplyDeleteमज़ा आ गया इस पोस्ट को पढ़ कर ... बहुत से सवालों का इतना सटीक जवाब .... अफ़सोस होता है प्रिंट मीडीया या टी वी मीडीया ऐसी बातें करता हुवा नज़र नही आता ...
ReplyDeleteसही सवाल-जबाब हैं। अभी तक नहीं मिटा भ्रष्टाचार तो इसका मतलब यह थोड़ी आगे भी नहीं मिट सकता। :)
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