पिछले कई दिनों से मैं कुछ अच्छी चीजें, अच्छे क्षण याद कर रहा था। जब अच्छी चीजों की या फिर कहें अच्छे क्षणों की बात करें तो निश्चित है कि बचपन की यादें उसमें अवश्य होंगी कुछ अपवादों को छोड़ कर, क्योंकि दुनिया के प्रत्येक माँ-बाप यही चाहते हैं कि उनके बच्चों का बचपन अच्छा गुजरे। जब मैं अपने जीवन को दोहराने बैठा तो जो कुछ स्मृतियों ने लौटाया उसे मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। अब से करीब अट्ठाइस बरस पहले, जब मेरी उम्र करीब सात वर्ष थी, की स्मृतियों में सबसे पहले जिस चीज का ध्यान आता है वह है भाप के इंजन वाली रेलगाड़ी। छुक-छुक की आवाज करती हुई, धुआं निकलती हुई, कम भीड़ वाले प्लेटफार्म, कम भीड़ वाले डिब्बे। कस्बे में लगा हुआ मेला, मेले में सजी दुकानें, सर्कस, भोंपू बजाते हुए लड़के। धूल उड़ाते हुए घोड़े, बैलगाडियां, ताँगों, साइकिलों से, पैदल आते हुए लोग। प्लास्टिक के क्रूड खिलोने, प्लास्टिक का चश्मा और कांच के हरे-पीले-नीले कंचे। बाइस्कोप, बड़ा सा रेडियो, लिटाने वाला टेप-रिकॉर्डर, चाबी भरकर चलाने वाला लाउड़-स्पीकर, बड़ा सा डॉज ट्रक, मेटाडोर मिनी-बस। जावा, यज्दी और राजदूत, लैम्बी और लेम्ब्रेटा। बीच से ...
और उम्मीद ही क्या की जा सकती है.खुले आम यह हाल है तो शालाखो के अंदर तो न जाने क्या हाल करते होंगे.
ReplyDeleteशर्मनाक चेहरा..
ReplyDeleteइसीलिए इनके मरने पर कुछ खास दुःख नहीं होता
अमर्यादित और दुर्भाग्यपूर्ण।
ReplyDeleteबेहद अफसोसजनक ..... ऐसा व्यवहार बहुत दुखद है....
ReplyDeleteतभी तो लोग इन्हें खाकी वाले गुंडे कहते है
ReplyDeleteहमारे यहां यह पुलिस थोडे हे गुंडे हे साले, इन्हे नाक पोछना नही आता उन्हे गालिया सीखा कर ओर मार पीट सिखा कर जनता को मारने के लिये तेयार करते हे, ओर नेताओ के जुते साफ़ करने की ट्रेनिंग ब्झी इन को दी जाती हे.. लानत हे इन पर
ReplyDeleteHuman Rights ki paribhasha yehi hai
ReplyDeleteभारतीय पुलिस नही भारतीय जनता का प्यार है भाई इतना अत्याचार सहने के बाद भी इन्का प्यार कम नही होता
ReplyDeleteमन क्षोभ से भर जाता है।
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